विज्ञापन

आज का शब्द: असंपृक्त और धर्मवीर भारती की कविता 'उसी ने रचा है'

काव्य डेस्क

Aaj Ka Shabd
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            
हिंदी हैं हम शब्द-शृंखला में आज का शब्द है असंपृक्त जिसका अर्थ है 1. अलग; पृथक 2. उदासीन। कवि धर्मवीर भारती ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है। 


नहीं-वह नहीं जो कुछ मैंने जिया
बल्कि वह सब-वह सब जिसके द्वारा मैं जिया गया

नहीं,

वह नहीं जिसको मैंने ही चाहा, अवगाहा, उगाहा-
जो मेरे ही अनवरत प्रयासों से खिला
बल्कि वह जो अनजाने ही किसी पगडंडी पर अपने-आप
मेरे लिए खिला हुआ मिला
वह भी नहीं
जिसके सिर पंख बाँध-बाँध सूर्य तक उड़ा मैं,
गिरा-गिर गिर कर टूटा हूँ बार-बार
नहीं-बल्कि वह जो अथाह नीले शून्य-सा फैला रहा
मुझसे निरपेक्ष, निज में असम्पृक्त, निर्विकार

नहीं, वह नहीं, जिसे थकान में याद किया, पीड़ा में
पाया, उदासी में गाया
नहीं, बल्कि वह जो सदा गाते समय गले में रुँध गया
भर आया
जिसके समक्ष मैंने अपने हर यत्न को
अधूरा, हर शब्द को झूठा-सा
पड़ता हुआ पाया-

हाय मैं नहीं,
मुझमें एक वही तो है जो हर बार टूटा है
-हर बार बचा है,
मैंने नहीं बल्कि उसने ही मुझे जिया
पीड़ा में, पराजय में, सुख की उदासी में, लक्ष्यहीन भटकन में
मिथ्या की तृप्ति तक में, उसी ने कचोटा है-
-उसी ने रचा है! 
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।
2 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

MURLI music

60 कविताएं

View Profile

samarth dalela

4 कविताएं

View Profile