'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- अकलुष, जिसका अर्थ है- कलुषता से रहित, निर्मल, शुद्ध, साफ़। प्रस्तुत है जानकीवल्लभ शास्त्री की कविता- फूलों का शृंगार बना दो तो जानूँ
तीखे काँटों को
फूलों का शृंगार बना दो तो जानूँ।
वीरान ज़िन्दगी की ख़ातिर
कोई न कभी मरता होगा,
तपती सांसों के लिए नहीं
यौवन-मरु तप करता होगा,
फैली-फैली यह रेत।
ज़िन्दगी है या निर्मल उज्ज्वलता?
निर्जल उज्ज्वलता को जलधर,
जलधार बना दो तो जानूँ।
मैं छाँह-छाँह चलता आया
अकलुष प्रकाश की आशा में,
गुमसुम-गुमसुम जलता आया :
उजलूँ तो लौ की भाषा में।
औंधा आकाश टँगा सर पर,
डाला पड़ाव सन्नाटे ने,
ठहरे गहरे सन्नाटे को
झँकार बना दो तो जानूँ।
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।