साहित्य, विचार और कलाओं की लोकप्रिय और बहु पठनीय साहित्यिक वेब मैगजीन समालोचन अपनी यात्रा के 10वे वर्ष में है। इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म के इस छोटे से प्रयास की 10 साल की यह यात्रा कई उपलब्धियो से भरी पड़ी है।
इंटरनेट ब्लॉगिंग से शुरू हुआ समालोचन का सफर साहित्य के इतिहास में ना केवल अनूठा, प्रयोगधर्मी और इतनी विषय विविधता से भरा पड़ा है कि उस पर अनुुवादक, लेखक, कवि और प्रखर समीक्षक विष्णु खरे की टिप्पणी और ज्यादा मानीखेज व सार्थक दिखाई पड़ती है।
“'समालोचन' पर जो यह सब हो रहा है, इसके लिए अद्भुत शब्द भी अपर्याप्त है। इन्टरनेेट और ब्लॉगिंग के इतने बहुआयामीय इस्तेमाल का ऐसा दूसरा उदाहरण विश्व में शायद अब तक देखा नहीं गया। और अभी तो यह ख़त्म नहीं हुआ है।"
विष्णु खरे (26/5/2016)
विष्णु जी कि ही बात को आगे बढ़ाएं तो समालोचन का एक दशक अब भी एक पड़ाव है और इस यात्रा को अभी और आगे जाना है। आज हिंदी की मुख्यधारा की साहित्यिक ई-पत्रिका के रूप में समालोचन की महत्वपूर्ण जगह है।
समालोचन को इस स्तर पर पहुंचाने और हिंदी साहित्य को नये स्वरूप में समृदध करने में संस्थापक, संपादक अरुण देव की सबसे अहम भूमिका है। उनके बिना समालोचन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। एक बिल्कुल नए माध्यम की पत्रिका को यहां तक लाने में एक संपादक के तौर पर उनकी यात्रा भी उतार-चढ़ाव से भरी रही है।
कवि, लेखक और संपादक अरुण देव का यह प्रयास हिंदी साहित्य में एक अलग योगदान ही है। समालोचन के माध्यम से उन्होंने बीते सालों में अपने पाठकों को ना केवल साहित्य बल्कि संगीत, सिनेमा, इतिहास, संस्कृति, समाज, दर्शन सहित ज्ञान-विज्ञान की बहुविध विषयों की स्तरीय और पठनीय सामग्री को परोसा है।
समालोचन का पहला अंक 12/11/10 अर्थात् 12 नवम्बर 2010 को प्रकाशित हुआ था। अगले माह यानी 12 नवंबर को ही इस वेब पत्रिका को एक दशक पूरा हो जाएगा। अमर उजाला ने साहित्यक वेब मैगजीन समालोचन के 10 वर्ष पूरे होने पर उसकी इस शानदार यात्रा, उपलब्धियों और भविष्य की तैयारियों को लेकर संपादक अरुण देव से खास बातचीत की।
अमर उजाला : समालोचन की शुरुआत कैसे हुई?
अरुण देव : एक दशक पहले भारत में नेट की उपलब्धता बढ़ी और फेसबुक पर लोगों की सक्रियता भी। हिंदी में सहजता से लिखने की सुविधा गूगल ने उपलब्ध कराई। इसका असर यह हुआ कि जिसे हम सोशल मीडिया कहते हैं उसपर हिंदी में सामग्री की बाढ़ सी आ गई। इसमें साहित्य भी था, ख़ासकर कविताएं, ब्लॉगिंग की भी शुरुआत हो चली थी। फेसबुक पर कविता को लेकर अराजकता की स्थिति थी जैसी आज ‘वेब-प्रसारण’ को लेकर है।
नए संभावनाशील कवियों को जहां मंच मिल गया था वहीं शौकिया कवि भी हर संभावित जगह पर अपनी कविताएं चिपका रहे थे। फेसबुक पर हिंदी कविता का स्तर बन नहीं पा रहा था इसलिए कुछ वरिष्ठ आलोचक और लेखकों ने फेसबुक पर छपने वाले कवियों को फेसबुकिया कवि कहना शुरू कर दिया था।
हालांकि उस समय फेसबुक पर कविता पोस्ट करने वाले प्रिंट में बीसियों साल से छप और रेखांकित हो रहे थे, बाद में वे वरिष्ठ लेखक भी फेसबुक पर आ गए। इससे इस माध्यम की पहुंच और अनिवार्यता का पता चलता है। कहानी और लेख के लिए भी जगह चाहिए थी।
ऐसे माहौल में किसी स्तरीय, सुरुचिपूर्ण और विश्वसनीय डिजिटल साहित्यिक पत्रिका की जरूरत महसूस हो रही थी जिसका बाकायदा संपादक हो और जो नियमित भी रहे। सामग्री भी पर्याप्त हो। ऐसा न हो की कविता के नाम पर किसी कवि एक दो कविताएं और लेख के नाम पर छोटी सी टिप्पणी रहे। पाठक आए तो उसे पढ़ने का सुख मिले।
मैंने इन्हीं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ब्लॉग प्लेटफार्म पर वेब पत्रिका निकालने का निर्णय लिया, और सोच समझकर इसका नाम ‘समालोचन’ रखा। इसको निकालते हुए मेरे ध्यान में दो पत्रिकाएं थीं- ‘सरस्वती’ जो साहित्य के साथ-साथ विचार, समाज और कलाओं को भी प्रमुखता देती थी दूसरी नामवर सिंह की ‘आलोचना’ जो विश्व स्तरीय साहित्यिक विमर्श और प्रगतिशील विचारों और साहित्य की संवाहक पत्रिका थी।
-जिसमें मैंने महत्वपूर्ण आलोचक मैनेजर पाण्डेय से ‘साहित्य का भविष्य और भविष्य का साहित्य’ पर बातचीत की थी। इस तरह से समालोचन के पहले अंक का शीर्षक भी भविष्य के साहित्य की ओर इशारा कर रहा था।
अब तक समालोचन के 1700 के आसपास एकल अंक प्रकाशित किए जा चुके हैं।PC: अमर उजाला
अमर उजाला : दस साल की यात्रा लंबी होती है? कोई पड़ाव, कभी विश्राम या ऊब कि इसे बंद कर देना चाहिए?
अरुण देव : किसी भी व्यक्ति के लिए नियमित ढंग से किसी पत्रिका का प्रकाशन और उसके स्तर को बनाए रखना दुरूह और मुश्किल कार्य है, ख़ासकर जब आप सबकुछ कर रहें हों- मतलब प्रूफ़, ले-आउट, सज्जा और फिर डाकिए का भी काम।
डिजिटल माध्यम ने यह सुविधा दी है कि अकेला व्यक्ति भी यह सब कर सकता है। पर है तो यह काम ही है। ज़ाहिर है यह थकाने वाला कार्य है। यह और चुनौतीपूर्ण बन जाता है जब आप किसी काॅॅर्पोरेट या सरकारी संरक्षण या मदद के बिना इसे अकेले किसी हाशिए जैसी जगह से कर रहें हों,जहां बिजली और नेट दोनों अनियमित हों। इसमें तो विज्ञापन तक नहीं दिया जाता है।
इन दस वर्षों में कई विवाद भी इससे जुड़े, कि इसपर कौन प्रकाशित होता है? और क्यों हुआ?और उसकी भूमिका में मैंने क्या लिखा इसपर भी पाठकों की आलोचनात्मक दृष्टि रहती है। कई बार विवाद कर्कश हो जाते हैं तो ऊब होती है।
संपादक के नाते आपको रचनाओं की चयन प्रक्रिया में बहुत कुछ पढ़ना पड़ता है। इनमें बहुत कुछ बकवास चीजें होती हैं, ज़ाहिर है इससे आप बच नहीं सकते। रचनाओं के प्रकाशन को लेकर अनावश्यक दबाव भी परेशान करता है।
मरहूम विष्णु खरे इसके प्रशंसक, लेखक और नियमित पाठक थे। उनके निधन से मैं बहुत निराश हुआ और एक बारगी इसे बंद करने का विचार भी मेरे मन में आया था।
अमर उजाला : वरिष्ठ से लेकर युवा तक और नई आमद भी समालोचन का हिस्सा है। कितने लेखक, कितनी पोस्ट हुई हैं अब तक? कितने पाठक सक्रिय हैं? रोजाना कितने घंटे काम करते हैं आप?
अरुण देव: ‘समालोचन’ ने हिंदी में मॉडरेटर की जगह संपादक लिखना शुरू किया और ख़ुद को ई/वेब पत्रिका कहना। समालोचन ने यह निर्णय लिया कि वह अप्रकाशित सामग्री में से ही अपने प्रकाशन के लिए रचनाओं का चयन करेगा।
शुरू में इस माध्यम को हल्का समझा जाता था। वरिष्ठ रचनाकार इसपर मूल रूप से प्रकाशित होना पसंद नहीं करते थे। समालोचन ने युवा से लेकर वरिष्ठ तक सबका विश्वास अर्जित किया और आज स्थिति बदल गई है।
किसी भी पत्रिका की सार्थकता यही है कि वह अपने समय की केन्द्रीय रचनाशीलता को समझे और उसे प्रकाशित करे। समाज तथा समय के संकट और चुनौतियों को रचनाओं के माध्यम से सामने लाए। आज समालोचन पर छपना प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। लगभग सभी लेखकों का सहयोग समालोचन को मिल रहा है।
वेब पत्रिकाओं ने अपने लेखक भी तैयार किए और पाठक भी। सहजता से प्रसारित होने के कारण कई छिपे लेखक सामने आए और आज उनकी पहचान है। इस अवसर पर मैं अपने सभी लेखकों और पाठकों का उनके रचनात्मक सहयोग के लिए आभार प्रकट करता हूं।
किसी भी सुरुचिपूर्ण अंक को तैयार करने के लिए औसतन पांच घंटे लगते हैं। पिछले दस सालों से रोज़ मैं पांच घंटे समालोचन को देता हूं। ज़ाहिर है इससे मेरा ख़ुद का लेखन, स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन प्रभावित हुआ है। लेकिन एक बेहतर अंक प्रकाशित करने का सुख और संतोष इन सभी चीजों से बड़ा है।
अब तक समालोचन के 1700 के आसपास एकल अंक प्रकाशित किए जा चुके हैं। लगभग 500 लेखक इससे जुड़े हैं। बीस हजार के आसपास पाठकों के पत्र इस पर प्रकाशित हो चुके हैं। यही नहीं हज़ारों की संख्या में पेंटिंग और चित्र भी इसपर आपको मिलेंगे।
समालोचन के संस्थापक संपादक, कवि और लेखक अरुण देव।PC: अमर उजाला
अमर उजाला : साहित्य की पारंपरिक पत्रिकाएं, साहित्य के डिजिटल प्लेटफॉर्म को कैसे देखते हैं?
अरुण देव: प्रारम्भ में जैसा कि होता है, उन्होंने इसके अस्तित्व से इनकार किया। बहुत दिनों तक उपेक्षा की, पर धीरे-धीरे इसके महत्व को समझते हुए उन्होंने इसका उपयोग भी शुरू कर दिया। पहल, तद्भव और हंस जैसी पत्रिकाएं मुद्रित होने के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी हैं।
मैं समझता हूं कि मुद्रित पत्रिकाओं को इसे खतरे के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह उनका सहयोगी हो सकता है और उनके प्रचार संख्या में भी इससे मदद भी मिलेगी।
समालोचन मुद्रित पत्रिकाओं के साथ है। मुद्रित में छपी महत्वपूर्ण सामग्री समालोचन आभार सहित छापता है। इसी तरह प्रिंट पत्रिकाएं भी समालोचन की छपी सामग्री का उपयोग करती हैं।
अमर उजाला : क्या वेब मैगजीन अथवा ऑनलाइन साहित्यिक पत्रिकाओं की लोकप्रियता के बीच साहित्यिक मुद्रित पत्रिका में प्रकाशित होना ही लेखक के रूप में स्थापित होना है जैसी मानसिकता से मुक्ति दिखाई देती है?
अरुण देव: पत्रिका किसी भी माध्यम में प्रकाशित हो रही हो, उसे संपादक के कारण जाना और माना जाता है। ‘सरस्वती’ बहुत दिनों तक निकलती रही पर हमें याद केवल महावीरप्रसाद द्विवेदी ही आते हैं। ‘आलोचना’ पत्रिका नामवर सिंह के कारण प्रख्यात हुई।
इसी तरह राजेन्द्र यादव ने ‘हंस’ को लोकप्रिय किया। ‘तद्भव’ अखिलेश और ‘पहल’ ज्ञान रंजन के कारण जानी जाती है। प्रिंट में सैकड़ों पत्रिकाएं निकलती हैं पर उनमें से बहुत को कोई जानता भी नहीं।
इसी तरह डिजिटल में भी पत्रिकाओं का जंगल उग आया है। अगर पत्रिका स्तरीय है चाहे वह किसी माध्यम में हो तो आपकी पहचान बनती है। बड़ी संख्या में वेब पत्रिकाओं में लेखकों का छपना यह बताता है कि ऐसा कोई आग्रह अब है नहीं।
अमर उजाला : इंटरनेट ब्लॉगिंग का सफर 2007 से रफ्तार पकड़ता रहा है। ब्लॉग ने लेखन की पुरानी पाटी को तोड़ा, नए प्रयोग हुए और रचनात्मक प्रयोगशीलता की नई धारा को जन्म दिया। आप समालोचन के संदर्भ में इसे कैसे देखते हैं?
अरुण देव: लेखन की मौखिक से मुद्रित और फिर डिजिटल तक की यह एक लम्बी यात्रा है, ज़ाहिर है जिस तरह हम मुद्रित से मौखिक की तरफ नहीं लौट सकते उसी तरह से डिजिटल को छोड़कर केवल मुद्रित पर निर्भर रहना भी संभव नहीं है। हां यह जरुर है कि मुद्रित और डिजिटल का प्रकाशन साथ-साथ चलें और एक दूसरे का सहयोग करें।
डिजिटल ने अगर पाठकों की संख्या में इजाफा किया है तो उसमें से कुछ पाठक प्रिंट पर भी जाएंगे। छोटे शहरों और कस्बों तक नेट 2010 तक पहुंच गया था। उस समय ब्लॉगिंग बहुत लोकप्रिय हुआ था, पर आत्मकेंद्रित होने, दुराग्रह और दूसरों पर बेवजह आक्रामक होने के कारण इनसे लोगों का मोहभंग भी हुआ।
जब पत्रिका का उद्देश्य साहित्य ने होकर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति करना या गुट निर्माण करना हो जाता है तब वह पत्रिका नष्ट हो जाती है। कुछ अनियमित होने के कारण भी ये धीरे-धीरे परिदृश्य से बाहर हो गईं।
लेखकों के अपने ब्लॉग हैं जिनमें मुख्यत: उनका साहित्य ही रहता है। ज़ाहिर है बड़े पाठक वर्ग तक पहुंचने में इस तरह के ब्लॉग की अपनी सीमाएं हैं।
समालोचन की प्रकृति पत्रिका की तरह थी, इसमें संपादक ने अपनी कविताएं या अपनी किताबों की समीक्षाएं या अपने ऊपर लेख छापने के विषय में कभी सोचा भी नहीं। नियमित होना, स्तरीय रचनाओं का चयन,लोकतांत्रिक प्रगतिशील दृष्टि, सुरुचिपूर्ण प्रकाशन ने इसे जल्दी ही लोकप्रिय कर दिया और यह अपने समय की प्रतिनिधि रचनाशीलता का केंद्र बन गया। इसमें साहित्य के साथ-साथ समाज, दर्शन, फिल्म, पेंटिंग, नृत्य, संगीत आदि विषयों पर भी स्तरीय सामग्री आपको मिलेगी।
अमर उजाला : क्या इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने साहित्य को कई स्तरों पर मुक्त किया है?
अरुण देव: साहित्य तभी साहित्य है जब वह छपकर पाठकों के बीच पहुंचे। पाठकों तक पहुंचाने का कार्य पत्र- पत्रिकाएं करती आईं हैं। महत्वपूर्ण पत्रिकाएं अक्सर बड़े शहरों से निकलती रही हैं, वहां मुद्रण की आधुनिक सुविधाएं रहती हैं।
ज़ाहिर है नए लेखकों खासकर वे अगर सुदूर जगहों पर हैं तो उनके लिए छपना मुश्किल होता है। नेट और सोशल मीडिया ने स्वतः प्रकाशन की सहूलियत प्रदान की जिससे यह हुआ कि वे सामने आने लगे। जो स्तरीय थे उनकी पहचान बनी और उन पर पत्र-पत्रिकाओं का भी ध्यान गया।
डिजिटल माध्यम ने कई प्रतिभाशाली लेखकों को सामने लाने में अपनी भूमिका का निर्वाह किया है। ख़ासकर साहित्य की पत्रिकाओं की अनुपलब्धता को इसने खत्म कर दिया है। पत्रिकाओं की जो भी भूमिका होती है उन्हें वेब पत्रिकाएंं भी बखूबी पूरा कर रहीं है, यही कारण है कि लगभग सभी प्रिंट पत्रिकाओं के वेब संस्करण भी साथ–साथ प्रकाशित हो रहें हैं। आज अगर आपके पास कुछ बेहतर लिखा हुआ है तो उसे आप डिजिटल माध्यम में कभी भी प्रकाशित कर सकते हैं। एक तरह से साहित्य का यह लोकतंत्र है।
अमर उजाला : इस समय हिंदी के कौन सी वेब पत्रिकाएं हैं जिन्हें आप बेहतर मानते हैं? समालोचन की क्या खास उपलब्धियां रही हैं?
अरुण देव: सबसे पहली और बड़ी बात यह है कि समालोचन ने एक हल्के समझे जाने वाले माध्यम को एक दशक में इस तरह बदल दिया कि आज इसमें छपना प्रतिष्ठा का विषय बन गया है।
साहित्य की ई/वेब पत्रिकाओं को आज पहचान का संकट नहीं है। आप इस प्लेटफाॅॅर्म पर पत्रिका शुरू कर सकते हैं। देश-विदेश में इसे पढ़ा जा रहा है। कई अख़बारों ने इसे रेखांकित किया है और कुछ समाचार चैनलों पर भी इसकी चर्चा हुई है। विश्वविद्यालयों के रीडिंग सैक्शन में यह शामिल है।
दूसरी बात यह कि आज हिंदी की मुख्यधारा में कई महत्वपूर्ण युवा रचनाकारों की शुरुआत और पहचान समालोचन से हुई है। एक तरह से 21वीं सदी के हिंदी साहित्य का आकार आप यहां देख सकते हैं। कई स्तम्भ बहुत लोकप्रिय हुए हैं। जैसे राकेश बिहारी का भूमंडलोत्तर कहानियों की विवेचना का स्तम्भ। इधर विख्यात चित्रकार रज़ा पर आप अखिलेश का स्तम्भ ‘रज़ा जैसा मैंने देखा’ पढ़ सकते हैं।
वरिष्ठ कथाकार बटरोही का स्तम्भ ‘हम तीन थोकदार’ निकल रहा है। अभी तक साहित्य की तिकडमी राजनीति से समालोचन बचा हुआ है यह भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं है।
दुर्भाग्य से विश्व की तीसरी बड़ी भाषा के साहित्य की स्तरीय, सुरुचिपूर्ण और नियमित वेब पत्रिकाएं बहुत कम हैं। मुझे ‘जानकी पुल’ और ‘सदानीरा’ पसंद हैं। ये दोनों नियमित निकलती हैं।
अमर उजाला : डिजिटल दुनिया में समालोचन का स्वरूप महज ब्लॉग भर है, यह कोई मुकम्मल वेबसाइट भी नहीं है, क्या इसके स्वरूप में बदलाव करेंगे? आगे क्या योजना है?
अरुण देव : ऐसा मैंने कई बार सोचा है कि इसे वेबसाइट में बदल दिया जाए। एक तो, सामग्री इसपर बहुत है और पत्र भी बेशुमार हैं। एक तरह से ये भविष्य में साहित्य के शोध सन्दर्भ की तरह ये हैं। सबको वेबसाइट पर लाना चुनौती भरा कार्य है। भविष्य में देखते हैं क्या होता है।
(अरुण देव के तीन कविता संग्रह प्रकाशित हैं। उन्हें कविता के लिए राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त सम्मान से सम्मानित किया गया है। पिछले दस सालों से वह समालोचन वेब पत्रिका का संपादन कर रहे हैैंं।)
5 वर्ष पहले