छायावादी युग के लोकप्रिय कवि सुमित्रानंदन पंत ने विवाह नहीं किया था। एक साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया कि क्या जीवन में सहगामिनी के न होने की छटपटाहट उन्हें महसूस होती है, तो वे अपने कविता-संग्रहों के नाम लेकर बताते हैं कि उनकी तमाम पुस्तकों में उनकी कविताओं के माध्यम से यह भाव दर्ज है। वह कहते हैं कि "मैं तो बहुत स्त्रियों को प्यार करता हूं, यह बात अलग है कि उन्हें अपना नहीं सका। स्त्रियों को तो मैं बहुत अधिक प्यार करता हूं क्योंकि मैं मानता हूं कि भविष्य में अगर मनुष्य को कोई शिक्षित बना सकती है तो वह स्त्री बना सकती है तब जब वह अपने शील में, अपनी सौम्यता में, अपने सौंदर्य में रहे और मनुष्य को प्यार करना सिखलाए। न कि अपनी देह से जैसे कि इस युग में देह को प्रमुखता दी गयी है।"
इसके अगले सवाल में जब आदर्श की उच्चता और देह की आवश्कता की बात की गयी तो महाकवि ने कहा कि "अगर केन्द्र ह्रदय हो जाए तो देह अपने आप ही आ जाएगी। लेकिन अगर ह्रदय ही न हो, देह ही देह हो तो ये बतलाइए कितना बड़ा संकट है।"
4 वर्ष पहले