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Ramdarash Mishra: अरे मैं, तो यहाँ हूँ... यहाँ हूँ... यहाँ हूँ...

डाॅ. देवेन्द्रनाथ तिवारी

Sahitya
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                            बात इसी फरवरी की है। दिल्ली का विश्व पुस्तक मेला। भीड़ उमड़ी थी। जैसे कोई नदी अपना किनारा खोज रही हो। सैकड़ों चेहरों के बीच अचानक एक चेहरा दीख पड़ा। झिलमिलाती आँखों में जीवन की उजास। सफेद बालों में बालपन की कोमल चमक। चेहरे पर वह मधुर गंभीरता, जो केवल वर्षों की आत्मा-संधान से आती है। लगा जैसे कोई पुरनिया अपने द्वार पर बैठा हो। जो सदा से वहीं था, बस हम ही देर से पहुँचे। कल अक्तूबर की आखिरी तारीख। फेसबुक पर एक पोस्ट पढ़ी। केशव मोहन पांडेय जी की। ‘आज सुगना पयान कर गया...।’ मन कहीं ठहर-सा गया। वह ‘सुगना’ कौन था? वही डुमरी वाले, कछार वाले श्रद्धेय रामदरश मिश्र जी।
        
                                                    
                            

वे चले गए।  31 अक्तूबर, 2025 की दोपहर। पर यह मृत्यु नहीं, महाप्रस्थान था। जीवन से शब्द तक और शब्द से लोक तक फैले उनके संपूर्ण स्वर का विलय था। वे गए नहीं, लौटे—उस माटी में, जहाँ से उनकी कविता ने पहली साँस ली थी। रामदरश मिश्र जी कछार के थे। राप्ति-गोर्रा की जल-संस्कृति से जन्मे, जहाँ पानी कभी स्थिर नहीं रहता। जहाँ नदी का उफान और नमी, दोनों जीवन के समान हैं। उनकी रचनाओं में वही जलधारा थी। वे राप्ति-गोर्रा के साक्षी रहे। कभी कोमल, कभी प्रचंड। यह पानी, उन्हें पानीदार बनाता था। उनके भीतर बोलता था। कभी कविता बनकर, कभी गद्य बनकर। कभी ‘घर की चिट्ठी’ के मानवीय स्वर में। पानी का यह बिंब केवल वातावरण नहीं, उनके भीतर की गति थी। तरल, स्वच्छ, आत्मीय।  

वे किसी ‘औरा’ के लेखक नहीं थे। वे गाँव के बुढ़वा बरगद की छाँव जस थे।  सहज, सुलभ और सादगी में विलक्षण। उनमें वह दुर्लभ विनम्रता थी। यह ताउम्र रही। जो मनई को पछुआ कादो-कनई से बचाती है। उसके संपर्क में आने, प्रदूषित होने से बरजती है। बुद्धि के दायरे को नहीं, मन को बड़ा करती है। वे कभी किसी को अपनी विद्या से आतंकित नहीं करते थे। उनका होना ही सीख थी।

उनसे मिलना, वैसे ही था, जैसे जेठ की दुपहरी में कोई पुरनिया अपनी गमछी की छाँव दे दे। अँकवार में भर ले। उनकी कविताएँ, गोर्रा की तरह बहती थीं। कलकल। बिन शोर, बिन प्रदर्शन। उनमें कछार की माटी का सौंधापन था। वे शब्दों के सौंदर्य पर नहीं ठहरे। लोक अनुभव, आत्म अनुभव के ताप में उन्हें पकाया। उनके यहाँ मनई ही मूल तत्व था। खेती, नदी, घर, किसान, सबमें एक ही मानव-सिद्धान्त का विस्तार।  

उनके भीतर न किसी वाद का अकड़ापन था, न किसी मंच की हड़बड़ी। वे जिस युग में रहे, उसमें भी निर्विवाद रहे। जैसे सदियों-पीढ़ियों की नदी अपने स्वयं के किनारों से सधकर बहना जानती है। उनके जीवन में विचार, मर्यादा के वस्त्र की तरह थे। सहज, स्वच्छ, अनगढ़ पर धवल।

एक सौ वर्ष के पार जाकर भी उन्होंने जीवन को सुघड़ सजगता से जिया। आज के कोलाहलमय लेखक-युग में उनका शांत मुख किसी शब्दवृक्ष की जड़-छाया जैसा था।  मिश्र जी का जाना किसी व्यक्ति का जाना नहीं, एक जीवन-संस्कार का परिवर्तित होना है। वे कबीर की तरह लोक में समा गए हैं। अब न वे कहीं दिखेंगे, न सुनाई देंगे, पर जब भी पुरबइया चलेगी, जब भी कछार के खेतों में किसान थके हुए बैलों को पुचकारेगा, और जब भी कोई विद्यार्थी ‘मनई’ शब्द के अर्थ खोजेगा, वहाँ कहीं वे होंगे।  मिश्र जी का जाना उनके मिटने का नहीं, हिंदी के लोक-पटल में गहरे उतर जाने का लक्षण है। वे वटवृक्ष की तरह समूचे लोक-संस्कार को जड़ों में समेटे हुए विदा हुए। और यह विदा नहीं, पुनर्वास है। विश्वास है, जब भी कोई गाँव, अपनी स्मृतियों में लौटेगा, जब कोई कवि अपनी भाषा को माटी से जोड़ेगा, वहाँ रामदरश मिश्र होंगे।

असल में मिश्र जी, विरल परंपरा के कवि थे। उनमें जीवन और साहित्य एक-दूसरे में लय रहे। विलीन। उनकी सीखावन, यादों की गठरी में आज भी है। संवेदना ही संस्कृति की असली धारा है।  पर, वे अब उस धारा में विलीन हैं। जैसे राप्ति का जल सरयू में समाता है। बस अपनी गंध, अपनी मिठास साथ लिये हुए। वे उसी चेतना के स्थायी गृह हैं, जहाँ शब्द और मौन एक-दूसरे को आलिंगन देते हैं। वे अब और कहीं नहीं, इस कछारी माटी के हर श्वास में हैं। लोकधारा में अपना प्रतिरूप छोड़ गए हैं। एक उजला, नम्र और निस्पृह मनई जस। जैसे पुकार रहे हों, ‘अरे मैं, तो यहाँ हूँ... यहाँ हूँ... यहाँ हूँ...’

(लेखक लोक संस्कृति के अध्येता व दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक आचार्य हैं)


 
10 महीने पहले
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