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"ढिबरी का तेल भी हमारे लिए बेशकीमती था"- उमेश पासवान

काव्य डेस्क

Mud Mud Ke Dekhta Hu
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चौकीदार की नौकरी करते हुए कविताएं लिखने के साथ मैं अपने गांव के दलित, वंचित बच्चों को निःशुल्क पढ़ाता भी हूं। मैं चाहता हूं कि मेरे गांव का हर बच्चा पढ़-लिखकर मिथिलांचल और मैथिली भाषा को गौरवान्वित करे।

मेरे मामा दिल्ली में एक स्कूल में पढ़ाने लगे थे, जिससे मेरे नाना घर में अकेले रह गए। मैं दो-तीन साल का रहा होऊंगा, जब मेरी मां परिवार के साथ अपने मायके रहने आ गई थीं। दरअसल सिर्फ नाना के अकेलेपन ने ही नहीं, बल्कि आर्थिक विपन्नता ने भी हमारे परिवार को इस फैसले के लिए मजबूर कर दिया था। वक्त बीतने के साथ मैं मधुबनी जिले के लौकही प्रखंड अंतर्गत औरहा गांव का हो गया। मैं एक थाने में चौकीदार हूं। मुझे यह नौकरी पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर हासिल हुई है। चौकीदार बनने से पहले मेरे पिता और मेरी मां दूसरों के खेतों में मजदूरी करते थे।
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भेदभाव ने लिखने के लिए प्रेरित किया...

बीस साल पुरानी बात है, एक प्रथा निभाते हुए मैं अपने खास दोस्त की शादी में उसके साथ बैठा था। लेकिन जब लोगों को पता चला कि मैं दूसरी जाति का हूं, उन्होंने मुझे वहां से उठा दिया। अपमान की ग्लानि में मैं इस कदर डूबा कि आधी रात को पैदल ही अपने गांव वापस आ गया। सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध कुछ लिखने की पहली प्रेरणा मुझे उसी घटना से मिली।

पहली रचना मिथिला के नाम...

मैट्रिक के बाद मैं मधुबनी पढ़ने आ गया। मैं वहां एक लॉज में रहता था। मेरे कमरे के पास ही एक मेरे एक सीनियर रहते थे, जिन्हें कविताएं लिखने का शौक था। यों तो मैं भी टूटा-फूटा ही सही, पर लिखना शुरू कर चुका था, लेकिन लॉज में रहते हुए मैंने अपने सीनियर से सीखकर बेहतर तरीके से लिखना शुरू किया। मैंने पहली कविता में मैथिली समाज और भाषा को शब्दों में पिरोया था।

जब बाढ़ पर लिखी कविता...

एक रोज मैंने एक स्कूल में काव्य गोष्ठी में कविता पाठ किया। यह पहला अवसर था, जब मुझे एक साथ कई लोगों का प्रोत्साहन मिला। लेखन के शुरुआती दौर में ही बाढ़ की विभीषिका पर लिखी मेरी कविता भी लोगों को काफी पसंद आई। मेरा हौसला बढ़ता गया और मैंने पढ़ाई के साथ लिखना जारी रखा। दस साल पहले एक दुर्घटना में मेरे पिता की मृत्यु हो गई। मेरे जीवन के उतार-चढ़ाव सहजता से मेरी कविताओं का हिस्सा बन गए। गरीबी के निजी अनुभव तथा ग्रामीण परिवेश की सामाजिक विसंगतियों ने मेरी कविताओं को दृष्टि दी।

मेरी कविता कोई नहीं सुनता था...

काव्य संगोष्ठियों में जाने के लिए मैंने कई बार झूठ बोलकर छुट्टियां ली हैं, क्योंकि कविता जैसे रचनात्मक कर्म को मेरे समाज ने कभी तवज्जो नहीं दी। मेरे पिता अक्सर यह कहते हुए मुझे डांटते थे कि ढिबरी का सारा तेल फालतू काम के लिए जलाने के बजाय पढ़ाई करो। हमारे लिए ढिबरी का तेल भी कीमती था। मैंने एक नेपाली एफएम रेडियो स्टेशन को अपनी कविताएं भेजनी शुरू कीं, जहां से मेरी कविताएं नियमित रूप से प्रसारित की जाने लगीं। रेडियो पर कविताएं सुनकर एक वरिष्ठ साहित्यकार ने मुझसे संपर्क किया और मेरा काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ। फिलहाल मैं गरीबों को केंद्र में रखकर कहानियां लिख रहा हूं।

-कविता संग्रह 'वर्णित रस' के लिए मैथिली भाषा में 2018 का साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार पाने वाले उमेश पासवान से नूतन कुमार गुप्ता की बातचीत पर आधारित।
8 वर्ष पहले
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