‘चाहे चिर गायन सो जाए,
और हृदय मुर्दा हो जाए,
किन्तु मुझे जब गाना ही है-
बैठ चिता की छाती पर भी,
मादक गीत सुना लूँगा मैं।
हार न अपनी मानूँगा मैं!’
बेशक नीरज जी ने वक्त से कभी हार नहीं मानी। अंतिम समय तक सक्रिय रहे। लेकिन आखिरकार उम्मीदों और रुमानियत से भरे इस महान गीतकार, कवि, शायर और एक बेहतरीन संजीदे इंसान ने ज़िंदगी से हार मान ही ली।
स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
जाड़े की गुनगुनी धूप और गरमी की शाम में अलीगढ़ के अपने मकान के बरामदे में बिस्तर पर लेटे लेटे अपना ज्यादातर वक्त गुज़ारने वाले नीरज जी अक्सर अपना यही गीत गुनगुनाते थे –
स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।
देवानंद और राजकपूर की बेहद इज्जत करने वाले, उन्हें सबसे समझदार और शानदार फिल्मकार बताने वाले नीरज जी के लिए उनका यादगार गीत भी हमेशा उनका साथ देता था – ‘दिल आज शायर है, ग़म आज नग़मा है।‘ इसी गीत को उन्होंने अपने फोन की कॉलर ट्यून भी बना रखा था।
सरलता और आत्मीयता परिपूर्ण व्यक्तित्व
गोपाल दास ‘नीरज’ को करीब से देखने और समझने का मुझे करीब डेढ़ साल पहले उनके घर में ही मौका मिला था। इससे पहले उन्हें कई दफा देखा, सुना लेकिन एक पूरा दिन उनके साथ गुज़ारना, उनके जीवन के तमाम पहलुओं के बारे में अंतरंग बातें और आज के दौर की कविता से लेकर गीतों तक के बारे में उनके अनुभव को जानना वाकई एक यादगार लम्हा बन गया।
उनके साथ आलू का पराठा, दही, अचार का नाश्ता और परिवार की तमाम बातें। इतनी सरलता और इतनी आत्मीयता आपको आज के दौर के कवियों, गीतकारों में नहीं मिल सकती। समाज और राजनीति से लेकर रिश्तों के ताने बाने तक को नीरज जी ने जिस गहराई से देखा, महसूस किया और शब्दों में पिरोया, वो हमेशा याद किया जाएगा।
लेकिन नीरज प्रेम के कवि थे, उनका कहना था कि कविता हमेशा गेय होनी चाहिए। नई कविता को वे कविता नहीं मानते थे और खुद को किनारे किए जाने को लेकर भी उनकी अपनी नाराजगी थी।
साहित्य की खेमेबाजी को लेकर वो दुखी रहते थे। लेकिन उनका मानना था कि समानांतर कविता आंदोलन के नाम पर लिखी जा रही कविताएं दरअसल कविता नहीं है।
इसीलिए वो कहते थे कि लोग मंचीय कवियों को बेशक दोयम दर्जे का मानें, लेकिन असली कवि वही हैं जिन्हें कम से कम लोग सुनते हैं, पसंद करते हैं और तालियां बजाते हैं। और इसीलिए इस उम्र में भी नीरज को लोग हर जगह बुलाते हैं और किसी भी मंच पर उनका होना एक बड़ी बात मानी जाती है।
बेशक अब मंच सूने हो जाएंगे। नीरज जी के बगैर तमाम कवि सम्मेलन खाली खाली लगेंगे और उनकी गैरमौजूदगी कविता प्रेमियों को हमेशा खलती रहेगी। लेकिन नीरज तो नीरज हैं। हमेशा रहेंगे। अपनी कविताओं के साथ, गीतों के साथ और शायरी के साथ।
8 वर्ष पहले