अशोक जी ने पापा से पेंटिंग करना सीखा। पापा ने उनसे होम्योपैथिक इलाज करना सीखा। इत्तेफाक देखिए कि पापा को अशोक जी के साथ पहली बार जब फिल्म में काम करने का मौका मिला, तो उन्होंने अशोक जी के पिता का रोल निभाया। बाद में पापा को पुलिस अधिकारी के रोल में इतनी बार दोहराया गया कि वे टाइप्ड हो गए।
हैरत वाली बात है कि किसी को गाने का शौक हो और वह बन जाए अभिनेता। मेरे पापा, अभिनेता इफ्तेखार साहब के साथ ऐसा ही हुआ। उन्हें बचपन से गाने का बहुत शौक था। वे कानपुर में रहते थे। उन्हें कला में भी बहुत दिलचस्पी थी। उन्होंने लखनऊ कॉलेज ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई की। संगीत का शौक उन्हें लखनऊ के मैरिस म्यूजिक कॉलेज, जो अब भातखंडे म्यूजिक एकेडमी के नाम से जाना जाता है, ले गया।
वे एक गायक बनना चाहते थे। के.एल. सहगल के गाने हूबहू सहगल की तरह गाने में उन्हें महारत हासिल हो गई थी। उन दिनों महत्वपूर्ण रिकॉर्डिंग कंपनियां कोलकाता में थीं। पापा एचएमवी कंपनी में गाना गाने के लिए कोलकाता जा पहुंचे। उनका ऑडिशन लेने वाले संगीतकार कमल दास गुप्ता, एम पी प्रोडक्शन नाम की फिल्म कंपनी में संगीतकार की हैसियत से काम करते थे। पापा ऑडिशन में कामयाब रहे। करीब छह महीने बाद उनके गाए गीतों का रिकॉर्ड बाजार में आया। पापा रातों रात कानपुर में स्टार बन गए।
विज्ञापन
कुछ दिनों बाद पापा के पास एमपी प्रोडक्शन से एक पत्र आया कि वह अगर चाहें, तो कंपनी में कलाकार की हैसियत से नौकरी कर सकते हैं। पापा को बाद में पता चला कि उनके बोलने का ढंग, उच्चारण और आवाज एमपी प्रोडक्शन के लोगों को बहुत पसंद आई थी। पापा दोस्तों की राय पर कोलकाता गए, जहां उन्हें फिल्मों में काम भी मिला, वह भी जमुना देवी जैसी प्रख्यात अभिनेत्री के साथ। इसी दौरान पापा की एक महिला हन्ना से मुलाकात हुई। हन्ना मेरी मां हैं।
पापा ने कोलकाता में तीन चार फिल्में ही की थीं कि 1946 में कोलकाता में दंगे भड़क उठे। पापा का परिवार तो सब पाकिस्तान चला गया था, लेकिन पापा ने मुंबई का रुख किया। वहां पापा की मुलाकात अशोक कुमार जी से हुई। जब पापा कोलकाता में थे, तब कनन देवी ने एक बार उन्हें पापा से मिलवाया था। वह मुलाकात ऐसी हुई कि जब पापा मुंबई आए, तब अशोक जी ने न सिर्फ उन्हें पहचाना, बल्कि बॉम्बे टॉकीज की फिल्म 'मुकद्दर’ (1950) में साइड हीरो का रोल दिलवा दिया।
पापा जिंदगी भर अशोक कुमार जी का एहसान मानते रहे, क्योंकि फिल्म ‘मुकद्दर’ में जो रोल पापा को मिला, वह अशोक कुमार के भाई अनूप कुमार को करना था। लेकिन पापा की मदद करने के लिए अशोक कुमार जी ने वह रोल पापा को दिला दिया। पापा और अशोक कुमार जी की गहरी दोस्ती हमेशा बनी रही। अशोक जी ने पापा से पेंटिंग करना और शतरंज खेलना सीखा, जबकि पापा ने अशोक जी से फ्रेंच पढ़ना और होम्योपैथिक इलाज करना सीखा। इत्तेफाक देखिए कि पापा को अशोक जी के साथ पहली बार जब एक फिल्म में काम करने का मौका मिला, जिसमें पापा ने अशोक जी के पिता का रोल निभाया। पापा को पुलिस अधिकारी के रोल में इतनी बार दोहराया गया कि वे टाइप्ड हो गए।
उन्होंने पहली बार बी.आर. चोपड़ा की फिल्म 'इत्तेफाक' में पुलिस इंस्पेक्टर का प्रभावशाली रोल अदा किया था। इसके बाद, तो पापा को प्रोड्यूसर ढूंढते हुए उनके घर आने लगे। पापा को पुलिस इंस्पेक्टर, डीसीपी, आईजी और पुलिस कमिशनर के रोल बार-बार दोहराने पड़े, हालांकि उन्होंने हर तरह के रोल निभाए। मिसाल के लिए फिल्म ‘नूरी’ में गरीब लकड़हारे और ‘इंसाफ का तराजू’ के जज को भुला पाना मुश्किल है।
पापा ने कुछ फिल्मों में निगेटिव किरदार भी निभाए। इन फिल्मों में ‘बंदिनी’, ‘सावन भादो’, ‘खेल खेल में’, ‘एजेंट विनोद’ आदि शामिल हैं। बहुत कम लोगों को पता होगा कि पापा ने 1967 में अमेरिकी धारावाहिक ‘माया’ के दो एपिसोड में भी काम किया था। पापा ने अपने करियर में चार सौ से ज्यादा फिल्मों में काम किया। मसाला फिल्में करते-करते उकता चुके पापा ने एक बार उद्देश्यपूर्ण फिल्म बनाने की कोशिश की थी। उन्होंने विमल आहूजा और जुल वेलानी के साथ मिलकर महज 14 दिनों में महात्मा गांधी के हत्यारों को बेनकाब करने वाले कथानक पर एक फिल्म 'ऐट फाइव पास्ट फाइव' बनाई। इस फिल्म को गांधी शताब्दी पुरस्कार तो मिला, लेकिन कुछ दिनों के बाद फिल्म को लेकर विरोध के स्वर उठने लगे और सरकार ने फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया।
पापा मेरी और मेरी छोटी बहन की पढ़ाई पर बहुत ध्यान दिया करते थे। हम दोनों बहनों की परवरिश उन्होंने बेटों की तरह की। पापा बहुत शांत और उसूलों वाली जिंदगी बिताने के आदी थे। मेरी मां से उनके जितने अच्छे रिश्ते थे, वैसे मैंने किसी पति–पत्नी के बीच नहीं देखे। 1994 में मेरी छोटी बहन की अचानक हुई मौत का पापा को गहरा सदमा लगा। तमाम कोशिशों के बाद भी वे संभल नहीं पाए और 4 मार्च 1995 को उनका निधन हो गया।
सलमा इफ्तेखार
अभिनेता इफ्तेखार खान की बेटी
-इकबाल रिजवी से बातचीत पर आधारित