एक गीत की आत्मा होते है उस गीत के हर्फ़ और उन हर्फ़ो को करीने से पिरोने वाला होता है एक गीतकार। ऐसा कलाकार जो अपने गीतों के बोल को तराशता है और एक वक़्त पर ही कई जगह होने की असंभव कल्पना को हकीकत कर देता है। एक समय में हजारों मन उस कलमकार को देख पाते है, महसूस कर पाते है उसके गीतों से। साथ ही उन लोगों के निजी अनुभवों और संवेदनाओ को भी दर्ज करता हुआ वो गीत कोमल स्मृतियों को ज़िंदा कर देता है जो अपनी बात महसूस करते हुए भी लोग कह नहीं पाते है।
एक गीतकार जिसने ढलती शामों में एक डोर से किसी की ओर खिचते मन के लिए गीत लिखा, जिसने प्रेम में लिखे गए खतों को कागज का टुकडा नहीं दिल लिखा, जिसने प्यार के दीवानेपन को लिखा, दो प्रेमियों की अलग थलग धुन को शब्द दिए और बताया कि रूठ कर जाना इतना आसान नहीं प्रेम के सारे रास्ते दिल तक ही लौटते है।
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ये थे हमारे हिंदी फिल्म जगत के गीतकार आनंद बक्शी। जिन्होंने खूबसूरत गीतों का तोहफा हमें दिया और इस आपाधापी भरी दुनिया में ठहरना कुछ आसान कर दिया।
आज उनकी पुण्यतिथि पर पेश है उनका आखिरी नग़मा जिसे निर्माता निर्देशक सुभाष घई की फिल्म मजनू के लिए संगीतकार अनु मलिक ने रिकॉर्ड किया था और उदित नारायण ने गाया था लेकिन ये गाना कभी उनके प्रशंसकों और उनको सुनने तक न आ सका क्योंकि ये फिल्म पूरी हुए बिना ही बंद हो गई।
मैं कोई बर्फ नहीं हूं जो पिघल जाऊंगा
मैं कोई हर्फ़ नहीं हूं जो बदल जाऊंगा..
मैं सहारों पे नहीं खुद पे यकीं रखता हूं
गिर पड़ूंगा तो हुआ क्या मैं संभल जाऊंगा..
चांद सूरज की तरह वक़्त पे निकला हूं मैं
चांद सूरज की तरह वक़्त पे ढल जाऊंगा..
काफिले वाले मुझे छोड़ गए हैं पीछे
काफिले वालों से आगे मैं निकल जाऊंगा...
मैं अंधेरों को मिटा दूंगा चरागों की तरह
आग सीने में लगा लूंगा मैं जल जाऊंगा..
हुस्नवालों से गुज़ारिश है के परदा कर लें
मैं दीवाना मैं आशिक हूं मचल जाऊंगा
रोक सकती है मुझे रोक ले दुनिया ‘बख्शी’
मैं तो जादू हूं मैं जादू मैं चला जाऊंगा..
- आनंद बख्शी
(21 जुलाई 1930 रावलपिंडीं - 30 मार्च 2002 मुंबई)