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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला: एक-दो मुलाकात में निकल जाता था साहित्य से संदेश 

काव्य डेस्क

Mud Mud Ke Dekhta Hu
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                                                  महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के जीवन से जुड़े ऐसे बहुत से किस्से हैं जो कला और साहित्य को परिभाषित करते हैं। उनका जीवन उनके नाम के अनुसार ही निराला था। जो भी निराला से मिलता वह उससे बातचीत के दौरान ही साहित्य का कोई न कोई संदेश निकाल देते थे। अपनी बातचीत को टिप्पणी या शीर्षक दे देते थे। उनसे एक युवक की मुलाकात का किस्सा हम मुड़ मुड़ के देखता हूं वर्ग के तहत पेश कर रहे हैं। ऐसे प्रसंगों का उल्लेख यहां इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हम यह बताना चाहते हैं कि निराला का चिंतन जियो और जीने दो की कला को ही श्रेष्ठ कला मानता था। 
 
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एक मद्रासी युवक निराला जी से सर्द मौसम में चादर मांगकर ले गया

एक मद्रासी युवक सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी से सर्द मौसम में चादर मांगकर ले गया। निराला जी के मित्र पाठक जी ने कहा कि यह आदमी अब आपको चादर वापस  नहीं करेगा। अभी दोपहर को गुदड़ी बाजार में आठ आने में बेच आएगा। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। चादर निराला जी के पास वापस आ गई। निराला ने चादर वापस होने का विश्वास जाहिर भी किया था। दो माह बाद वहीं मद्रासी युवक कांग्रेस के अधिवेशन की भीड़भाड़ में दूर से ही ऊंचे कदवाले निराला को पहचान लेता है, दौड़कर पास आता है। टूटी-फूटी हिंदी में अपना परिचय देता है। उसे अधिवेशन में कुछ दिनों के लिए स्वयंसेवक का धंधा मिल गया है। 
 

अबकी बार उसने कहा, गरमी बहुत पड़ने लगी है

वालंटियर की वर्दी में दोनों हाथ उठाकर युवक ने हर्षध्वनि की और लड़खड़ाती जुबान में कहा, मैं वही हूं जिसे आपने इलाहाबाद में चादर दी थी। निराला को उस  युवक में फिर से काव्य दिखने लगा। दो चार दिन बाद वह निराला से फिर मिला। अबकी बार उसने कहा, गरमी बहुत पड़ने लगी है। देश जाना चाहता हूं। रेल का किराया कहां मिलेगा, पैदल ही जाना पड़ेगा। निराला ने पूछा, कांग्रेस वाले क्या तुम्हारी  मदद नहीं कर सकते हैं। उसने कहा नहीं कांग्रेस में यह नियम नहीं है। उसने कहा खैर, मैं भीख मांगता-खाता पीता पैदल चला जाऊंगा। अपने नंगे पैरों की ओर देखकर वह बोला, गरमी बहुत पड़ रही है। पैरों में फफोले पड़ जाएंगे। अगर एक जोड़ी आप चप्पल ला दें। 
 

निराला ने लिखा, मैं लज्जा से वहीं गड़ गया

निराला की छाती फट गई यह सुनकर, उन्होंने लिखा मैं लज्जा से वहीं गड़ गया। मेरे पास तब केवल छह पैसे थे। उतने में चप्पल नहीं आ सकती थी। अपनी चप्पलें देखीं, घिसी पुरानी थीं। लज्जित होकर बोले, आप मुझे क्षमा करें, इस समय मेरे पास पैसे नहीं हैं। इसके बाद मद्रासी युवक वीर-भाव से निराला की ओर देखने लगा। फिर बड़े भाई की तरह उनसे आशीर्वाद लिया और मुस्कुराकर अमीनाबाद की ओर चला गया। निराला ने इस समूची घटना को लिखा और उसका शीर्षक दिया 'कला की रूपरेखा'। क्योंकि उनका चिंतन जियो और जीने दो की कला को ही श्रेष्ठ कला मानता था। 
 
-नया ज्ञानोदय से साभार
7 महीने पहले
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