जावेद अख़्तर के अपने पिता के साथ संबंध बहुत सहज नहीं थे। वो अपने आपको एक बाग़ी और नाराज़ बेटा मानते थे। अपनी मौत से कुछ दिन पहले जावेद अख़्तर के पिता ने उन्हें अपनी आख़िरी किताब ऑटोग्राफ करके दी थी, जिस पर लिखा था जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे। जावेद अख़्तर ने अपनी किताब तरकश में इस वाक़या का ज़िक्र किया है।
वह बम्बई में बिताए दिनों के बारे में लिखते हैं कि मैं बांद्रा में जिस दोस्त के साथ एक कमरे में आकर रहा हूं वो पेशेवर जुआरी है। वो और उसके दो साथी जुए में पत्ते लगाना जानते हैं। मुझे भी सिखा देते हैं। कुछ दिनों उनके साथ ताश के पत्तों पर गुज़ारा होता है फिर वो लोग बम्बई से चले जाते हैं और मैं फिर वहीं का वहीं अब अगले महीने इस कमरे का किराया कौन देगा।
एक मशहूर और कामयाब राइटर मुझे बुला के ऑफर देते हैं कि अगर मैं उनके डायलॉग लिख दिया करूं (जिन पर ज़ाहिर है मेरा नहीं उनका ही नाम जाएगा) तो वो मुझे छह सौ रूपये महीना देंगे। सोचता हूं यह छह सौ रूपये मेरे लिए इस वक़्त छह करोड़ के बराबर है, ये नौकरी कर लूं, फिर सोचता हूं कि नौकरी कर ली तो कभी छोड़ने की हिम्मत नहीं होगी, जिंदगी भर यही करता रह जाऊंगा, फिर सोचता हूं अगले महीने का किराया देना है, फिर सोचता हूं देखा जाएगा।
तीन दिन सोचने के बाद इनकार कर देता हूं। दिन, हफ़्ते, महीने, साल गुज़रते हैं। बंबई में पांच बरस होने को आए, रोटी एक चांद है हालात बादल, चांद कभी दिखाई देता है, कभी छुप जाता है। ये पांच बरस मुझ पर बहुत भारी थे मगर मेरा सर नहीं झुका सके। मैं नाउम्मीद नहीं हूं। मुझे यकीन है, कुछ होगा, कुछ ज़रूर होगा, मैं यूं ही मर जाने के लिए नहीं पैदा हुआ हूं.. और आखिर नवम्बर 1969 में मुझे वो काम मिलता है जिसे फ़िल्मवालों की ज़ुबान में सही ब्रेक कहा जाता है।
कामयाबी भी जैसे अलादीन का चिराग़ है। अचानक देखता हूं कि दुनिया ख़ूबसूरत है और लोग मेहरबान। साल-डेढ़ साल में बहुत कुछ मिल गया है और बहुत कुछ मिलने को है। हाथ लगते ही मिट्टी सोना हो रही है और मैं देख रहा हूं- अपना पहला घर, अपनी पहली कार। तमन्नाएं पूरी होने के दिन आ गए हैं मगर ज़िंदगी में एक तनहाई तो अब भी है।
सीता और गीता के सैट पर मेरी मुलाकात हनी ईरानी से होती है। वो एक खुले दिल की, खरी ज़ुबान की मगर बहुत हंसमुख स्वाभाव की लड़की है। मिलने के चार महीने बाद हमारी शादी हो जाती है। मैंने शादी में अपने बाप के कई दोस्तों को बुलाया है मगर अपने बाप को नहीं ( कुछ ज़ख्मों को भरना अलादीन के चिराग़ के देव के बस की बात नहीं)- वे काम सिर्फ वक़्त ही कर सकता है)। दो साल में एक बेटी और एक बेटा, ज़ोया और फ़रहान होते हैं।
अगले छह वर्षों में एक के बाद एक लगातार बारह सुपर हिट फिल्में, पुरस्कार, तारीफ़ें, अख़बारों और मैगज़ीनों में इंटरव्यू, तस्वीरें, पैसा और पार्टियां, दुनिया के सफ़र, चमकीले दिन, जगमगाती रातें- जिंदगी एक टेक्नीकलर ख़्वाब है, मगर हर ख़्वाब की तरह यह ख़्वाब भी टूटता है। पहली बार एक फिल्म की नाकामी- ( फिल्में तो उसके बाद नाकाम भी हुईं और कामयाब भी मगर कामयाबी की वो ख़ुशी और ख़ुशी की वो मासूमियत जाती रही)।
18 अगस्त 1976 को मेरे बाप की मृत्यु होती है ( मरने से नौ दिन पहले उन्होंने मुझे अपनी आख़िरी किताब ऑटोग्राफ करके दी थी, उस पर लिखा था जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे। उन्होंने ठीक लिखा था)। अब तक तो मैं अपने आपको एक बाग़ी और नाराज़ बेटे के रूप में पहचानता था मगर अब मैं कौन हूं। मैं अपने-आपको और फिर अपने चारों तरफ़, नई नज़रों से देखता हूं कि क्या बस यही चाहिए था मुझे ज़िंदगी से। इसका पता अभी दूसरों को नहीं है मगर वो तमाम चीजें जो कल तक मुझे ख़ुशी देती थीं झूठी और नुमाइशी लगने लगी हैं। अब मेरा दिल उन बातों में ज़्यादा लगता है जिसे दुनिया की ज़ुबान में कहा जाए तो, कोई फ़ायदा नहीं। शायरी से मेरा रिश्ता पैदाइशी और दिलचस्पी हमेशा से है।
लड़कपन से जानता हूं कि चाहूं तो शायरी कर सकता हूं मगर आज तक की नहीं है। ये भी मेरी नाराज़गी और बग़ावत का एक प्रतीक है। 1979 में पहली बार शेर कहता हूं और ये शेर लिखकर मैंने अपनी विरासत और अपने बाप से सुलह कर ली है। इसी दौरान मेरी मुलाकात शबाना आज़मी से होती है। कैफ़ी आज़मी की बेटी शबाना भी शायद अपनी जड़ों की तरफ लौट रही है।
उसे भी ऐसे हज़ारों सवाल सताने लगे हैं जिनके बारे में उसने पहले कभी सोचा नहीं था। कोई हैरत नहीं कि हम क़रीब आने लगते हैं। धीरे-धीरे मेरे अंदर बहुत कुछ बदल रहा है। फ़िल्मी दुनिया में जो मेरी पार्टनरशिप थी टूट जाती है। मेरे आसपास के लोग मेरे अंदर होने वाली इन तब्दीलियों को परेशानी से देख रहे हैं। 1983 में मैं और हनी अलग हो जाते हैं। (हनी से मेरी शादी ज़रूर टूट गई मगर तलाक़ भी हमारी दोस्ती का कुछ नहीं बिगाड़ सका। और अगर मां-बाप के अलग होने से बच्चों में कोई ऐसी कड़वाहट नहीं आई तो इसमें मेरा कमाल बहुत कम और हनी की तारीफ बहुत ज़्यादा है। हनी आज एक बहुत कामयाब फिल्म राइटर है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त। मैं दुनिया में कम लोगों की इतनी इज़्ज़त करता हूं जितनी इज़्ज़त मेरे दिल में हनी के लिए है।
(जावेद अख़्तर की किताब तरकश का एक अंश)
9 वर्ष पहले