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'अब मैं बड़ा हो गया हूं, लड़की को पहली बार लव लेटर लिख रहा हूं'

काव्य डेस्क

Mud Mud Ke Dekhta Hu
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                            जावेद अख़्तर से बेहतर संस्मरण बहुत कम लोग ही लिख पाएंगे। शायर जब अपना संस्मरण लिखता है तो वह बेहतरीन होता है। जावेद ने अपनी किताब तरकश में अपने जीवन से संबंधित कई रोचक संस्मरण पेश किए। इन संस्मरणों में वह अपनी जिंदगी के ब्योरे परत दर परत खोलते चले जाते हैं। 
        
                                                    
                            

अपनी किताब तरकश में जावेद अख़्तर लिखते हैं कि "आजकल लव लेटर लिखना भले ही गु़ज़रे ज़माने की बात हो, लेकिन उन दिनों बाक़ायदा मोहब्बत का इज़हार करने के लिए लव लेटर बहुत मुफ़ीद माना जाता था। और जब लिखने वाला जावेद अख़्तर जैसा फ़नकार हो तो कहने ही क्या। हालांकि, यह लव लेटर उनकी जिंदगी का पहला और आख़िरी लव लेटर साबित हुआ। जावेद अख़्तर ने ख़त लिखने के किस्से को अपनी किताब तरकश में भी क़लमबंद किया है। 

वो लिखते हैं अब मैं कुछ बड़ा हो चला हूं। मैं 15 साल का हूं और ज़िंदगी में पहली बार एक लड़की को खत लिख रहा हूं, मेरा दोस्त बीलू मेरी मदद करता है। हम दोनों मिलकर यह खत तैयार करते हैं। दूसरे दिन एक खाली बैडमिंटन कोर्ट में वो लड़की मुझे मिलती है और हिम्मत करके मैं यह खत उसे दे देता हूं। यह मेरी ज़िंदगी का पहला और आख़िरी प्रेम पत्र है। (उस खत में क्या लिखा था, यह भूल गया लेकिन वो लड़की आज तक याद है)। 

मैट्रिक के बाद अलीगढ़ छोड़ रहा हूं। मेरी ख़ाला बहुत रो रही हैं और मेरे मौसा उन्हें चुप कराने के लिए कह रहे हैं कि तुम तो इस तरह रो रही हो जैसे यह भोपाल नहीं वार फ्रंट पर जा रहा हो (उस वक्त न वो जानते थे और न मैं जानता था कि सचमुच war front पर ही जा रहा था)।

आगे का किस्सा जावेद साहेब कुछ यूं सुनाते हैं "शहर भोपाल किरदार, अनगिनत मेहरबान, बहुत से दोस्त और मैं…….अलीगढ़ से बम्बई जाते हुए मेरे बाप ने मुझे भोपाल या यूं कहिए आधे रास्ते में छोड़ दिया है। कुछ दिनों अपनी सौतेली मां के घर में रहा हूं। फिर वो भी छूट गया। सैफ़िया कॉलेज में पढ़ता हूं और दोस्तों के सहारे रहता हूं। दोस्त जिनकी लिस्ट बनाने बैठूं तो टेलीफ़ोन डायरेक्टरी से मोटी किताब बन जाएगी। आजकल मैं बीए सेकेन्ड इयर में हूं। अपने दोस्त एजाज़ के साथ रहता हूं। किराया वो देता है। मैं तो बस रहता हूं। वो पढ़ता है और ट्यूशन करके गुज़र करता है। सब दोस्त उसे मास्टर कहते हैं………मास्टर से किसी बात पर झगड़ा हो गया है। बातचीत बंद है इसलिए मैं आजकल उससे पैसे नहीं मांगता, सामने दीवार पर टंगी हुई उसकी पैंट में से निकाल लेता हूं या वो बगैर मुझसे बात किए मेरे सिरहाने दो-एक रूपये रखकर चला जाता है।

मैं बीए फाइनल में हूं, यह इस कॉलेज में मेरा चौथा बरस है। कभी फ़ीस नहीं दी……कॉलेज वालों ने मांगी भी नहीं, यह शायद सिर्फ़ भोपाल में ही हो सकता है। कॉलेज के कम्पाउंड में एक ख़ाली कमरा, वो भी मुझे मुफ़्त दे दिया गया है, जब क्लास ख़त्म हो जाती है तो मैं किसी क्लास रूम से दो बेंच उठाकर इस कमरे में रख लेता हूं और उन पर अपना बिस्तर बिछा लेता हूं। बाकी सब आराम है बस बैंचो में खटमल बहुत हैं। जिस होटल में उधार खाता था वो मेरे जैसे मुफ्तख़ोरों को उधार खिला खिलाकर बंद हो गया है।"

उसकी जगह जूतों की दुकान खुल गई है। अब क्या खाऊं। बीमार हूं, अकेला हूं, बुखार काफ़ी है, भूख उससे भी ज़्यादा है। कॉलेज के दो लड़के, जिनसे मेरी मामूली जान पहचान है मेरे लिए टिफ़िन में खाना लेकर आते हैं मेरी दोनों से कोई दोस्ती नहीं है, फिर भी अजीब बेवकूफ़ हैं, लेकिन मैं बहुत चालाक हूं, उन्हें पता भी नहीं लगने देता कि इन दोनों के जाने के बाद मैं रोऊंगा। 

मैं अच्छा हो जाता हूं। वो दोनों मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो जाते हैं …….मुझे कॉलेज में डिबेट करने का शौक़ हो गया है। पिछले तीन बरस से भोपाल रोटरी क्लब की डिबेट का इनाम जीत रहा हूं। इंटर कॉलेज डिबेट की बहुत सी ट्रॉफियां मैंने जीती हैं। विक्रम यूनिवर्सिटी की तरफ़ से दिल्ली यूथ फ़ेस्टिवल में भी हिस्सा लिया है। कॉलेज में दो पार्टियां हैं और इलेक्शन में दोनों पार्टियां मुझे अपनी तरफ़ से बोलने को कहती हैं….मुझे इलेक्शन से नहीं, सिर्फ बोलने से मतलब है इसलिए मैं दोनों तरफ़ से तक़रीर कर देता हूं। 

(जावेद अख़्तर की किताब तरकश का एक अंश)
9 वर्ष पहले
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