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साहिर ने लफ़्ज़ों में बयां किया मुहब्बत का दर्द 'जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला'

काव्य डेस्क

Mere Azeez Filmi Nagme
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सन् 1957 में फ़िल्म आयी थी प्यासा जिसमें गुरुदत्त एक हताश प्रेमी की भूमिका में थे, वह एक ऐसे कवि के किरदार में हैं जिसकी न किताब को ही सफ़लता मिल पा रही है और प्रेम तो उसको असफ़ल साबित कर ही चुका है।

उस पर भी क़िस्मत की मार ये है कि नौकरी मिली भी तो प्रेमिका के पति के दफ़्तर में और अकस्मात जब उसके घर पर सालों पुराने उसी प्यार से भेंट हो जाए तो आप भी कहेंगे कि…

जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला
हमने तो जब कलियाँ माँगी काँटों का हार मिला


शिद्दत से इश्क़ करना कुछ यूं है कि किसी तितली के पंखों में आपने 2 रंग और जोड़ दिए हों लेकिन जब उस प्रेम को मुकाम ना मिले तो रंगबिरंगी दुनिया भी फ़ीकी लगने लगती है और हर वो व्यक्ति थोड़ा विशेष लगता है जो महबूबा के साथ सफ़र कर रहा होता है। इन भावनाओं को शब्द देने का काम साहिर लुधियानवी से बेहतरीन कोई नहीं कर सकता। उन्होंने इस अधूरी दास्तान को यूं लिखा है जैसे इसको उन्होंने करीब से जीया हो।
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खुशियों की मंज़िल ढूँढी तो ग़म की गर्द मिली

खुशियों की मंज़िल ढूँढी तो ग़म की गर्द मिली
चाहत के नग़मे चाहे तो आहें सर्द मिली
दिल के बोझ को दूना कर गया जो ग़मखार मिला
हमने तो जब…


एस. डी. बर्मन का संगीत और हेमंत कुमार की आवाज़ आपको इश्क़ के उस दौर में ले जाएगी जहां प्यार की कोई कहानी अपने पूरा होने का इंतज़ार कर रही है, ऐसा इंतज़ार जो शायद कभी ख़त्म ही नहीं होगा। यूं तो वक़्त में हर जख़्म को भरने की ताकत है लेकिन प्रेम का घाव ही इतना गहरा है जिसके पत्ते ना पतझड़ में उतरते हैं और ना ही किसी शरद में उस पर बर्फ़ की चादर चढ़ती है।

बिछड़ गया हर साथी देकर पल दो पल का साथ

बिछड़ गया हर साथी देकर पल दो पल का साथ
किसको फ़ुरसत है जो थामे दीवानों का हाथ
हमको अपना साया तक अक्सर बेज़ार मिला
हमने तो जब…


मुहब्बत में अगर साथी का साथ मिल गया तो मंज़िल मिल जाती है लेकिन जो वह दो बिछड़ गए तो ज़माना हाथ थामने नहीं आता क्यूंकि ज़माने को ना ही मोहब्बत समझ आती है और ना ही मुहब्बत करने वाले इसलिए साहिर ने कहा कि इश्क़ तो वो है जिसमें सायाभी अपना नहीं लगता, बस दिल है और आप जिसे तन्हा ये सफ़र तय करना है और सफ़र का समय भी नहीं मालूम।

इसको ही जीना कहते हैं तो यूँ ही जी लेंगे

इसको ही जीना कहते हैं तो यूँ ही जी लेंगे
उफ़ न करेंगे लब सी लेंगे आँसू पी लेंगे
ग़म से अब घबराना कैसा, ग़म सौ बार मिला
हमने तो जब…


7 वर्ष पहले
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