ज़िंदगी में हम क्या विकल्प चुनते हैं उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि हम कौन सा विकल्प छोड़ते हैं। ये सवाल सिर्फ़ हालातों का नहीं लोगों का भी है। ज़िंदगी में एक दौर ऐसा भी आता है जब आप हम अतीत की तरफ़ बढ़ते हैं तो सोचते हैं कि वो दिन शायद बेहतर थे। वो लोग शायद बेहतर थे, वो मक़ाम शायद बेहतर था। वो फ़ैसले शायद ग़लत थे और वे निर्णय शायद जल्दबाज़ी में लिए गये थे।
1974 में आई फ़िल्म आपकी कसम का यह गाना मुझे अपने हालातों से रू-ब-रू होने और फ्लैशबैक में जाकर चीज़ों को देखने और उन्हें टटोलने का मौक़ा देता है। गाने की पहली लाइन ही हमको हमीं से दो चार कराती है।
बहुत दर्द भरी आवाज़ के साथ यथार्थवादी होते हुए किशोर कुमार गाते हैं
ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मक़ाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते
वो 'फिर नहीं आते' में ज़ोर देना असल में अपनी कहानी ही लगती है। लग रहा है कि एक चेतावनी सी दी जा रही है। जैसे-जैसे यह गाना आगे बढ़ता जाता है यह मानों आपसे सवाल करता हुआ चलता है। यह गाना सुनते वक़्त मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि मानों ये मेरे ऊपर ही लिखा गया है।
सृजन की सफलता भी इसी बात में है कि हर पढ़ने वाले को लगे कि वह उसी के लिए लिखा गया है। वह ख़ुद को उस पात्र के रूप में रखे तो इस नज़रिए से गाने की हर लाइन मुझे अपनी ही लगती है।
फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं
फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं मगर
पतझड़ में जो फूल मुरझा जाते हैं
वो बहारों के आने से खिलते नहीं
इन लाइनों में एक तरह की चेतावनी है। चेतावनी है वर्तमान की उपेक्षा की। साथ ही यह लाइन थोड़ी सी फ़िलॉसिफ़कल हो जाती है। फ़िलॉसफ़ी कहती है कि ज़िंदगी मौके़ सबको देती है फूल बनाकर। लेकिन यदि हम उन मौक़ों के प्रति असंवेदनशील होते हैं वो मौक़े हमारे हाथ से चुपचाप सरक जाते हैं।
संभावनाओं के साथ गाने की लाइनें जीवन में आने वाले लोगों की तरफ़ भी इशारा करती हैं। यहां भी एक चेतावनी है कि यदि आपने उनकी क़द्र न समझी तो वो लोग ज़िंदगी में लौटकर फिर उस तरह से नहीं आते।
कुछ लोग जो सफ़र में बिछड़ जाते हैं...
गाने की लाइनें देखिए...
कुछ लोग जो सफ़र में बिछड़ जाते हैं
वो हज़ारों के आने से मिलते नहीं
उम्र भर चाहे कोई पुकारा करे उनका नाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते
ज़िन्दगी के सफ़र में ...
रिश्तों का अधकचरापन और विश्वास न करने की सोच यहां गाने के माध्यम से ख़ूबसूरती से शमिल होती है।
आंख धोखा है, क्या भरोसा है
आंख धोखा है, क्या भरोसा है सुनो
दोस्तों शक़ दोस्ती का दुश्मन है
अपने दिल में इसे घर बनाने न दो
कल तड़पना पड़े याद में जिनकी
रोक लो रूठ कर उनको जाने न दो
बाद में प्यार के चाहे भेजो हज़ारों सलाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते
ज़िन्दगी के सफ़र में ...
ज़िंदगी चलती रहती है, ये किसी के लिए रुकती ठहरती नहीं
ज़िंदगी चलती रहती है, ये किसी के लिए ठहरती नहीं है। ज़िंदगी में कभी निर्वात नहीं आता। हां एक ख़ालीपन आता है लेकिन हालात ऐसे बनते हैं कि उस ख़ालीपन का भी कोई न कोई विकल्प आ जाता है। गाने की लाइनें ज़िंदगी के तेज़ चलने की ओर इशारा करती हैं, साथ ही इंसान के हालातों को जज कर पाने की क्षमता पर सवाल भी खड़ा करती हैं।
सुबह आती है, शाम जाती है
सुबह आती है, शाम जाती है यूंही
वक़्त चलता ही रहता है रुकता नहीं
एक पल में ये आगे निकल जाता है
आदमी ठीक से देख पाता नहीं
और परदे पे मंज़र बदल जाता है
एक बार चले जाते हैं जो दिन\-रात सुबह\-ओ\-शाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते
ज़िन्दगी के सफ़र में ...
मौक़ा कोई भी हो यदि यह गाना बज रहा होता है तो यह मुझे जिंदगी के बीत चुके हज़ारों लम्हों और हालातों के बीच लाकर खड़ा कर देता है जहां जीवन के कई प्रश्नों और निर्णयों से मैं दो-चार हो रहा होता हूं। सुनिए ये अज़ीज़ गाना...
8 वर्ष पहले