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सिन्दूर की प्रतिज्ञा

Yuvraj Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पहलगाम चीखा, अश्रुओं से भीगा गगन,
        
                                                    
                            
निर्दोषों की चीखें बनीं अनुनय-वन्दन।
घाटी के फूलों में लहू की बारिश थी,
औरत की मांग से उजाले की ख्वाहिश थी।

दर्द नहीं अब मौन रहेगा, उठेगा सिंह-स्वर,
भारत की आत्मा बोलेगी, प्रतिशोध अग्निपथ पर।
ऑपरेशन ना केवल योजना – ये गर्जना थी हुंकार की,
जवाब था हर उस गोली का, जो चली माँ की मांग पर वार की।

रात नहीं थी उस दिन बस समय संक्रमण था,
जब वायु-वीर चले, तो युद्ध स्वयं प्रेरण था।
झुकी नहीं एक भी आँख, न काँपे कोई मन,
क्योंकि हर एक बम में था उस माँ का जलता वचन।

“सिन्दूर मेरा अपमान नहीं अब और सहा जाएगा,
अब बेटा नहीं, सिंह उठेगा — और गगन दहला जाएगा।”

जिस रेखा को मिटाने निकले थे आतंकी दिन-रात,
उसी रेखा से फूटा भाल — बना प्रलय अगात।
जहाँ सीमा पे धूल उड़ती थी नपुंसक मौन की,
अब वहाँ सेश बना इतिहास भारत के स्वाभिमान की।

ऑपरेशन सिंदूर था ज्वाला — नारी के आँसुओं का संचित स्वर,
जिसने दिखा दिया विश्व को — कैसे जलता है भारतीय हृदय अंदर।
अब हर वीर के रक्त में, माँ का आशिष जलता है,
हर शहीद के शब्दों में, राष्ट्रध्वज पलता है।
जो समझे भारत को मौन, अब वो भूल चुका है मर्म,
"सिन्दूर" अब कोई श्रृंगार नहीं — यह है एक युगधर्म!
एक वर्ष पहले
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