गाँव की मिट्टी फिर से बोले,
पद की चाह में सभी डोले।
हर द्वार बैठी पद की चाहत,
फिर भी सपनों की पोल खोले।
घोषणाएँ गूंजें गली-गली,
पोस्टर-मंच सजे अनगिन,
जनता के मत का सूरज निकले,
जो सच बोले उसी के संग।
चूँकि हर बार बदलती तस्वीर,
वादों का फिर दस्तूर नया,
आशाओं का बोझ लिए चल पड़ा,
फिर गाँव में चुनाव आया।
-युवराज सिंह