बर्फीली चोटियाँ गवाह थीं, जब लहू ने दी रौशनी,
हर कदम पे बढ़ा जवान, मौत से की दोस्ती।
तोपों की आग में खिली, मातृभूमि की प्रार्थना,
छाती में था जय हिंद, आँखों में बस एक वंदना।
न चिठ्ठी पहुँची घर तक, न लौटे कुछ पैगाम,
पर हर बलिदान गा रहा — "मैं ही हूँ हिंद का नाम!"
वो जंग नहीं थी सिर्फ़ सरहद की —
वो था भारत का अभिमान।