गाँव के नुक्कड़ पे बैठा वो हक्कू,
न टोपी सही, ना भाषण में दम!
बाकी सब बोले, “अरे ये भी लड़ेगा?”
जिसे हर कोई समझे चुटकुलों का ग़म।
चप्पलें घिसी, कुर्ता थोड़ा फटा,
जेब में सपना, ख्वाबों की बटा।
पोस्टर पर नाम जैसे मजाक सा लगे,
पर दिल में उसका इरादा सच्चा लगे।
न चाल में नारा, ना भीड़ का रेला,
सिर्फ़ एक साइकिल, और विचार अकेला।
लोग हँसते हैं — "इसका क्या होगा?"
पर हक्कू बोले — "कुछ तो होगा!"
चुनाव में आया वो टोपी पहन के,
न नज़र में वोट, न उम्मीद बहन के।
पर बोले — “लोकतंत्र है भाईसाहब!
यहाँ सपना देखने का हक तो है न सबका?”
गांव वाले कहें — "इज्जत तो है नहीं,"
पर मन में उसके हौसला कहीं!
ना जीत का डर, ना हार की चिंता,
बस लड़ने का उसका है जज्बा अनमोल जिंदा।
पर सोचो तो सही, वो हँसी भी क्या हँसी थी,
जो किसी नादान से उम्मीद को जमीं देती रही।
क्योंकि एक हक्कू जब वोट मांगने चला,
तो लोकतंत्र थोड़ा और जिन्दा हुआ लगा।