नज़र को अब हर एक शय बेताब लगती है,
वही तू है, वही मै हूँ , मगर अब तू ख़्वाब लगती है।
रात ढले जो याद तेरी बेहिसाब आती है
मेरी उंगलियां सिगरेट पर , फिर सिगरेट में आग लगती है
ये जो मेरे जख्म सवाल पूछते है मुझसे
एक तू और तेरी तस्वीर ही , इनका जवाब लगती है
पन्नों के दरमियाँ मुरझाया गुलाब मेरा मालूम पड़ता है
महक रही है आज भी , मुझे ये वही किताब लगती है ,
शायर बनते है अक्षर , इश्क से ठोकर खाकर
ठोकर चोट–ए–शबाब लगती है,
शायरी चोट पे जवाब लगती है ।
और वो जो दूर रहा नशे से मै एक ज़माने तक , कबीर!
अब हर रात होठ पे शराब लगती है
शराब भी अजाब ( सजा) लगती है ।