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ज़रुरी तो नहीं

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर ख़त तेरा पैग़ाम हो,ज़रूरी तो नहीं।
        
                                                    
                            
सहर के जैसी हो शाम,ज़रुरी तो नहीं।।

प्यास बुझाने को,सब आते हैं मयकदे।
सबके लिए हो जाम , ज़रूरी तो नहीं।।

हजारों ख्वाहिशें लेकर, जीते हैं सभी।
हसरतें पूरी हों तमाम,ज़रूरी तो नहीं।।

बेवफाई के डर से,मुहब्बत छोड़े कैसे।
हस्ब-ए-मर्ज़ी,अंज़ाम ज़रूरी तो नहीं।।

राह-ए-हयात का,एक मुसाफ़िर हूं मैं।
सफ़र का हो मकाम, ज़रूरी तो नहीं।।

यहां, हर बाज़ार के सलीके अलग हैं।
सब बिकें अपने दाम, ज़रुरी तो नहीं।।

मेरे दोस्त गुज़रते हैं,इस गली से रोज।
मेरे घर पे हो कयाम, ज़रूरी तो नही।।

घर यूं घर है,अगर माहौल है घर का।
फिर, ये दर-ओ-बाम ज़रुरी तो नहीं।।
-यूनुस खान
2 सप्ताह पहले
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