फिर से सुना,कुरबत-ओ-करार की बातें।
पतझड़ में कर मौसम-ए-बहार की बातें।।
बड़ी खुदगर्ज हो गयी हैं , शै मेरे घर की।
हो सके तो कर , किसी खुद्दार की बातें।।
छींटाकशी ने इस कदर मायूस किया है।
लगने लगीं हैं सब बातें, बेकार की बातें।।
एक मुद्दत हुई,घर से बिछड़े हुए मुझको।
किससे करूं, मैं दर-ओ-दीवार की बातें।।
बा-मकसद है,शिरकत-ए-बज़्म-ए-तरब।
सुनने को मिलेंगी हमको, यार की बातें।।
जहां कभी करते थे,हम गुफ्तगू-ए-वस्ल।
याद आती हैं आज, उस दयार की बातें।।
जो सर-ए-राह छोड़ कर चले गये हमको।
अब वो भी कर रहे हैं, किरदार की बातें।।
सहरा की तपिश से , राहत मिले शायद।
ऐ बागबां,कर दरख़्त-ए-चिनार की बातें।।
-यूनुस खान