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वो बातें

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            फिर से सुना,कुरबत-ओ-करार की बातें।
        
                                                    
                            
पतझड़ में कर मौसम-ए-बहार की बातें।।

बड़ी खुदगर्ज हो गयी हैं , शै मेरे घर की।
हो सके तो कर , किसी खुद्दार की बातें।।

छींटाकशी ने इस कदर मायूस किया है।
लगने लगीं हैं सब बातें, बेकार की बातें।।

एक मुद्दत हुई,घर से बिछड़े हुए मुझको।
किससे करूं, मैं दर-ओ-दीवार की बातें।।

बा-मकसद है,शिरकत-ए-बज़्म-ए-तरब।
सुनने को मिलेंगी हमको, यार की बातें।।

जहां कभी करते थे,हम गुफ्तगू-ए-वस्ल।
याद आती हैं आज, उस दयार की बातें।।

जो सर-ए-राह छोड़ कर चले गये हमको।
अब वो भी कर रहे हैं, किरदार की बातें।।

सहरा की तपिश से , राहत मिले शायद।
ऐ बागबां,कर दरख़्त-ए-चिनार की बातें।।
-यूनुस खान
2 महीने पहले
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