शाम ढलने से पहले , थककर बिखर जाता हूं।
खुद को समेटकर, मैं फिर अपने घर जाता हूं।।
साकी, मयकशी की तलब बाकी नहीं बचती।
जब मैं जाम की तरह अश्कों से भर जाता हूं।।
तवील सफर को , मुख्तसर करने की खातिर।
मैं अक्सर मयकदे की राहों से गुज़र जाता हूं।।
बुझते चिराग़ों को जलाने की जहमत न उठा।
मैं तो आजकल , उजालों से भी डर जाता हूं।।
दरिया-ए-उल्फत के आदाब, हमें मालूम नहीं।
अफसोस , फिर भी क्यूं इसमें उतर जाता हूं।।
-यूनुस खान