सारी हदें फिर कर गयी , रूसवाई हमारी।
इस हकीकत से महरूम है,तन्हाई हमारी।।
हमसे , तर्क-ए-ताल्लुक़ करके जाने वाले।
महसूस होगी , तुझको भी जुदाई हमारी।।
इस तरह , यूं ज़ुल्म-ओ-सितम ढाने वाले।
तुझे वफ़ा में दिखती है , बेवफाई हमारी।।
यकीनन,कुरबत पे सवाल खड़े करती है।
ये ग़ैरों से, यूं बढ़ती हुई शनासाई हमारी।।
खुदा करे , उदासियां रास आने लगे हमें।
ऐ सन्नाटों,करो हौंसला-अफजाई हमारी।।
-यूनुस खान