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ये रूत,ये घुमड़ते हुए बादल और पुरवाई झोंके।

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ देर को रुक जाये,अगर बरसात सावन की।
        
                                                    
                            
शब-ए-वस्ल मानकर मना लूं ,ये रात सावन की।।

ये रूत,ये घुमड़ते हुए बादल और पुरवाई झोंके।
हां लुत्फ़-अंदोज कर देंगे, मुलाकात सावन की।।
-यूनुस खान
एक महीने पहले
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