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मेरे गिले-शिकवे भी बेमानी समझता है

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरे गिले-शिकवे भी बेमानी समझता है।
        
                                                    
                            
वो, कब मेरे घर की वीरानी समझता है।।

हर शाम , एक नये दर्द से गुजरता हूं मैं।
नये जख्म को वो चोट पुरानी समझता।।
-यूनुस खान
2 महीने पहले
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