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मैं तन्हा इन साहिलों पर यूं रुकूं कब तक।

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरा हर दर्द, हर पीर, उसे पुरानी लगती है।
        
                                                    
                            
इसलिए मुझे ये अयादत बेमानी लगती है।।

मैं तन्हा इन साहिलों पर यूं रुकूं कब तक।
ठहरी-ठहरी ये मौज़ों की रवानी लगती है।।
-यूनुस खान
एक घंटा पहले
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