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काश दरिया-ए-उल्फत का कोई किनारा होता।

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            काश दरिया-ए-उल्फत का कोई किनारा होता।
        
                                                    
                            
फिर हम भी किसी के होते, कोई हमारा होता।।

माना , रस्म-ओ-रिवाज का तकाज़ा है फांसले।
मान लेते,गर इतने आसान,तन्हा गुजारा होता।।
-यूनुस खान
8 घंटे पहले
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