काश दरिया-ए-उल्फत का कोई किनारा होता।
फिर हम भी किसी के होते, कोई हमारा होता।।
माना , रस्म-ओ-रिवाज का तकाज़ा है फांसले।
मान लेते,गर इतने आसान,तन्हा गुजारा होता।।
-यूनुस खान
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