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कभी कुरबत थी

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी कुरबत थी, जिन ठिकानों से।
        
                                                    
                            
मैं अब बहुत दूर हूं, उन मकानों से।।

ये सन्नाटे, ये ख़ामोशी,छोड़ दूं कैसे।
जीना सीखा है मैंने, इन वीरानों से।।

ऐ साकी,बता मुझे क्या हो गया है।
प्यास बुझती नहीं , इन पैमानों से।।

बदले हुए निजाम से , मजबूर हुए।
वर्ना दूर कब थे , इन मयखानों से।।

ये सोचकर , क़ैद हो गया हूं घर में।
कौन बात करें , इन बदजुबानों से।।

मैं मान गया, मगर दिल नहीं माना।
कब तक, इसे बहलाऊं बहानों से।।
-यूनुस खान
एक महीने पहले
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