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कभी कुरबत थी

                
                                                         
                            कभी कुरबत थी, जिन ठिकानों से।
                                                                 
                            
मैं अब बहुत दूर हूं, उन मकानों से।।

ये सन्नाटे, ये ख़ामोशी,छोड़ दूं कैसे।
जीना सीखा है मैंने, इन वीरानों से।।

ऐ साकी,बता मुझे क्या हो गया है।
प्यास बुझती नहीं , इन पैमानों से।।

बदले हुए निजाम से , मजबूर हुए।
वर्ना दूर कब थे , इन मयखानों से।।

ये सोचकर , क़ैद हो गया हूं घर में।
कौन बात करें , इन बदजुबानों से।।

मैं मान गया, मगर दिल नहीं माना।
कब तक, इसे बहलाऊं बहानों से।।
-यूनुस खान
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12 घंटे पहले

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