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साफ़गोई को, पसंद करते ही नहीं हैं लोग।

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अगरचे,अपने ही ग़म समझे,ग़म दोस्तों के।
        
                                                    
                            
मगर अयादत को ना उठे,क़दम दोस्तों के।।

साफ़गोई को, पसंद करते ही नहीं हैं लोग।
समझा रहे हैं हमें, पेंच-ओ-ख़म दोस्तों के।।

कितनी ही गर्दिशों में , घिरा हो वजूद मेरा।
होते नहीं फिर भी, चश्म-ए-नम दोस्तों के।।

ज़माने की नज़र से,छुपाये रखा अब तक।
हुए जो हमपे, ज़ुल्म-ओ-सितम दोस्तों के।।

फहरिस्त बनकर , आ गये अब बाज़ार में।
थे जो सारे, अहसान-ओ-करम दोस्तों के।।
-यूनुस खान
2 सप्ताह पहले
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