विज्ञापन

क्या है शम्मा के करीब परवानों का इकट्ठा होना।।

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बेबस नहीं यूं साहिल पर तूफ़ानों का इकट्ठा होना।
        
                                                    
                            
बेमानी है नम आंखों में अरमानों का इकट्ठा होना।।

बड़ी तवक्को थी मयखाने आकर ये प्यास बुझेगी।
पर आस तोड़ गया प्यासे पैमानों का इकट्ठा होना।।

दर-ए-मुंसिफ जाके इंसाफ की गुहार लगाते कैसे।
हमें डरा गया,यूं बेईमान दरबानों का इकट्ठा होना।।

ख़ुदा के लिए अब बज़्म सजाने की जिद न करो।
बज़्म ख़ुद सजा देता है, दीवानों का इकट्ठा होना।।

शाम ढलते ही सितारों ने आकर ये पूछा है हमसे।
क्या है शम्मा के करीब परवानों का इकट्ठा होना।।
-यूनुस खान
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all