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गीत - रूह भीतर गुनगुनाती है

Yogendra Vyom

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                            मौन को सुनकर कभी देखो
        
                                                    
                            
रूह भीतर गुनगुनाती है
ज़िन्दगी का गीत गाती है

झूठ के सुख-साधनों को तज
छल-भरे आश्वासनों को तज
रोग बनते जा रहे हैं जो
शोर के विज्ञापनों को तज
मौन को चुनकर कभी देखो
रूह भीतर खिलखिलाती है
ज़िन्दगी का गीत गाती है

दृष्टि में थोड़ा खुलापन ले
इन्द्रधनुषी कुछ नयापन ले
बालपन-सी ताज़गी के सँग
सोच में थोड़ा हरापन ले
मौन को बुनकर कभी देखो
रूह भीतर चहचहाती है
ज़िन्दगी का गीत गाती है

बंदिशें सब तोड़ बंधन की
साजिशें सब छोड़ उलझन की
गंध डूबे शब्द कुछ लेकर
तुम कभी आयत बनो मन की
मौन को गुनकर कभी देखो
रूह भीतर मुस्कुराती है
ज़िन्दगी का गीत गाती है
- योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’
 
2 महीने पहले
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