मुझे पता है
उसकी दुआओं में
अब वो असर नहीं,
क्योंकि मैं उसके दिल में नहीं रहती हूँ,
इक दुआ अपने लिए
अब खुद कर लेती हूँ,
अपनी कविताओं की बस्ती में
खुश रह लेती हूँ।
अब आईने से नज़रें चुराती नहीं मैं,
लोगों के तानों से घबराती नहीं मैं,
अपने आँसुओं पे जी भर मुस्कुरा लेती हूँ,
अपनी नजर ख़ुद उतार लेती हूँ।
क्या फर्क पड़ता, कोई साथ दे या न दे,
अगर तन्हाई मेरी तक़दीर हैं तो
अब शिकवा नहीं किसी से,
मैं अपनी खुशी खुद बुन लेती हूँ।
अपनी बनाई दुनियां में मग्न रह लेती हूँ।
अपनी कविताओं की बस्ती में
खुश रह लेती हूँ।
-नीरू जैन