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जंगल सफारी

Vishwambhar Sati

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उषा काल
        
                                                    
                            
अरुण की लालिमा का इंतजार
कुछ अंधेरों में
कुछ उजालों की ओर
हम चले जंगल सफारी की ओर।
चीला के रमणीय जंगल
सूर्य की लालिमा
अंधकार मिटाते
रोशनी फैलाते
ले जा रही थी हमें जंगल की ओर।
घने जंगलों के बीच
गहरी घाटियां
ऊंची पहाड़ियां
हम निकल गए थे
पशु विहार की ओर।
मनोहर, प्रिय, और सुखदायी
पशु-पक्षियों की चहचहाहट
मुखर होकर कह रही थी—
जागो! हो गया है अब सवेरा
और तुम बढ़ चलो हमारी ओर।
मृगों की आहट
चीते की दहाड़
हम बढ़ चले थे
घने जंगल की ओर।
प्रसन्न भाव से
मुखर होकर
सोच रहे थे—
कितने मासूम होते हैं ये जीव-जंतु,
खुद तो करते हैं संघर्ष
और लोगों को देते हैं सुख हर्ष।
मृगों के झुंड
फुदकते, दौड़ते, चहकते, महकते
फुसफुसाहट करते, निडर एवं निर्भीक
एक अनंत की खोज में विचरण करते।
हम भी मृगों के इन झुंडों के साथ
बढ़ रहे थे आगे।
कभी इनको निहारते
कभी स्वयं को संभालते।
फिर अचानक सहम से गए थे हम।
ये सोचने लगे—
कि कितने स्वार्थी हो गए हैं हम,
अपने हित के लिए
करते इन मासूमों का अहित।
इनका करते-करते विहार
हम करने लगे हैं आहार।
2 घंटे पहले
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