इक बात जो हम जानते हैं, कि ग़ैर नहीं हैं,
इक बात जो ग़ैर जानते हैं, कि हम ग़ैर हैं,
अपने-अपने तबीयत की नुमाइश क्यों करें,
जब ख़ामोशी में हम इक-दूसरे का दिल जानते हैं।
-विष्णु नेह