सब सामान ट्रक में लदने के बाद
जब खाली घर को मुड़कर देखा
तो पिछले बीते सात साल
आँखों के आगे तैरने लगे।
पीछे से बाबा ने कंधे पर हाथ रखा,
बोले- कुछ रह गया क्या?
मैंने कहा, मन भारी है
जैसे यहाँ मेरा एक अंश छूटा जाता है।
बाबा हंसे, उन्हें सब पता है।
बोले, यहाँ तो कई अंश हैं-
मकान बनाकर उस मज़दूर ने भी
एक बार पीछे मुड़कर देखा होगा,
पिछले किराएदार ने भी,
चिड़िया, कबूतरों ने भी उड़ान से पहले
शायद पीछे मुड़कर देखा होगा।
इन सबके थोड़े से बिखरे टुकड़े
यहाँ रहकर तुमने उठा लिए,
अब कुछ अपने यहाँ छोड़ चलो।
निरंतरता के क्रम में
हम सब एक दूसरे के पूरक हैं,
कोई यहाँ पर शुद्ध नहीं,
सब मिश्रित और यूँ ही पाक हैं
बस कभी जानते नहीं, कभी मानते नहीं।
बीते लम्हे, बीते किस्से,
किरदार कुछ उन किस्सों के
मुझमें हैं, तुममें हैं
और तुम मैं कुछ उन किरदारों में।
भविष्य में है थोड़ा भूतकाल
जैसे आकाश में है पाताल भी।
तो कुछ लम्हे, किस्से उठा चलो
कुछ छोड़ चलो संसार में।
कि एक दूजे में जीते चलें
रंग, जात, धर्म शुद्धता के
मिथ्या दायरों को
छोड़ के अब पीछे चलें।
--विनीता शर्मा
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