विज्ञापन

प्रतिदिन महँगाई बढ़ती

Vineeta Karmsheel

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            प्रतिदिन महँगाई बढ़ती,
        
                                                    
                            
बढ़ता नहीं पगार ।
छोटा बच्चा बढ़ता है,
पर बढ़ता नहीं पगार।।

बढ़ती ज़िम्मेदारी उम्र के संग,
पर बढ़ता नहीं पगार।
शौक हमारे बढ़ते नित दिन,
बढ़ता नहीं पगार ।।

सोते-जागते फ़िक्र बस,
पगार की रहती है।।
लबों पे शांति पर,
दिल में आँधियाँ बहती हैं।।

नींद में भी हिसाब,
पगार का ही चलता है,
जागूँ तो भी जोड़-घटाव में,
ही दिन ये ढलता है।।

मेहनत का यहाँ मोल नहीं,
भाव चालाकी का मिलता है।
पगार बढ़ाने के लिए,
हर कोई चाल यहाँ पर चलता है।।

छोटा हो या बड़ा अधिकारी,
पगार देख कर हँसता है।
जैसे-जैसे घटता है ये,
रोष दिल में पलता है।।

आग लगी है दाम में,
सामान पड़े गोदाम में,
छूते ही महँगाई बढ़ जाए,
जी ना लगे किसी काम में।।

ऊँची-ऊँची पहाड़ जैसी
उम्मीदें हमारी।
पगार के चक्कर में हमने,
बंदर सी छलांगे मारी।।

जेब में पड़ी पगार,
अमीरी का एहसास दिलाती है।
आधे महीने में ही लक्ष्मी,
मंद-मंद मुस्काती है।।

बचा-बचाकर चलना पड़ता,
रुकता नहीं है खर्चा।
महीने के अंत से पहले,
खत्म पगार का चर्चा...
भैया, खत्म पगार का चर्चा..!!
-विनीता कर्मशील
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all