चलते हुए विफलता देखी है,
रुकती हुई सफलता देखी है..!!
गरीबी में खिलती मासूमियत देखी है,
उत्पादों में छिपी मूर्खता देखी है..!!
संत देखा, महंत देखा,
रोग देखा, भोग देखा..!!
अब भी लगता है कुछ नहीं देखा है,
पर दिल कहता है क्या खूब देखा है, क्या खूब देखा है..!!
इंसानों की बस्ती में,
हर धूर्त अपनी मस्ती में,
रिश्तों की उड़ती गुड्डी,
हर मरहम पर रख धन की गड्डी।
आगे बढ़ता इंसान, देखा है,
मुस्काते हर, बलवान देखा है।
अब भी लगता है कुछ नहीं देखा है,
पर दिल कहता है क्या खूब देखा है, क्या खूब देखा है..!!
त्योहार वही हैं, रूप नया,
श्रृंगार वही, अनुरूप नया है।
संवरते लड़के देखें हैं,
बिखरती लड़कियाँ देखी है।
पाक कला निपुनः बेटे,
उड़ान भरते बेटियाँ देखी हैं।
ज़माना बदलते सुबह-शाम देखा है,
अब भी लगता है कुछ नहीं देखा है,
पर दिल कहता है क्या खूब देखा है, क्या खूब देखा है..!!
समझ ना पाए, वो जहान देखा है,
जानवर बराबर इंसान देखा है।
कद से बड़ा आन देखा है,
अंधकार में सना ज्ञान देखा है।
युग बदला,इंसान बदले,
मैंने, ख़ास की झुंड से लड़ता एक आम देखा है।
अब भी लगता है कुछ नहीं देखा है,
पर दिल कहता है क्या खूब देखा है, क्या खूब देखा है..!!
-विनीता कर्मशील