कांपता है अब भी हल्कू
जाड़ों की रातों में,
मुट्ठी भर अन्न
और सोहना साहु
के कर्ज अदायगी की खातिर,
जागता है आज भी
सारी रात
करता है खांस खांस कर
खेतों की रखवाली,
छलनी हो चुके
अपने इकलौते कम्बल
और दम तोड़ते हुक्के के सहारे,
पूस-माघ की निर्दयी रातों में
ठण्ड को पीने की कोशिश में
हुक्के की गुड़गुड़ाहट
और बलगम भरी
खांसी की आवाज से
हो जाता है अहसास
खेत में चरते छुट्टा ढोरों
और मुंशी जी को
कि आज भी जिन्दा है
हल्कू अपने झोपड़े में ,
अपने फटे कम्बल
और हुक्के के साथ
अमरता का अभिशाप लिए
इस इंतजार में
कि कोई तो होगा
जो मुंशी जी के जीर्णोद्धार के साथ
करेगा उसका भी उद्धार
और मुक्त करेगा उसे
फटे कम्बल और
दो जून की रोटी की चिन्ता से
जिसे दूर करना चाहते थें
मुंशी जी ,
कलम के सिपाही बनकर ।