कहने को सावन आ गया,
पर नहीं आई तुम।
उन अनगिनत ख्वाबों की स्मृतियों में,
ओझल हो गई कहीं तुम।
देखता हूँ बादलों को तो,
तुम्हारे श्याम केश याद आते हैं।
बारिश की हर बूँद में,
तुम्हारी दो प्यारी आँखें याद आती हैं।
पवन के हर झोंके में,
तुम्हारे आने का स्पंदन होता है।
धरा पर गिरती हर बूँद से,
तुम्हारी पायल की झंकार याद आती है।
प्रकृति की हरियाली में,
तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा याद आता है।
शायद इस नव-सृजन में,
कहीं खो गई तुम।
कहने को तो सावन आ गया,
पर नहीं आई तुम।
:- विनम्र तिवारी