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मन की आवाज़

Vimal Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन की आवाज
        
                                                    
                            

नव प्रभात में, नव जीवन की, नव आशाएं ढूंढ रहा हूँ ,
जीवन पथ पर राही बनकर संघर्षों से जूझ रहा हूँ ;
संशयों के भव सागर में क्यों मैं डोल रहा हूँ ?,
बहुत हो चुका संघर्षों का अब मंजिल को धर रहा हूँ।
मैं 'मन' बोल रहा हूँ। 

इस समाज का अभिन्न अंग हूँ, कुरीतियों से आ गया तंग हूँ ,
ऊंच-निच की इस परिपाटी के विपरीत, मैं सभी वर्गों के संग हूँ ;
जानता हूँ यह आसाँ नहीं इतना, फिर भी रार ठाना हूँ,
अब ठानी है कुछ करने की, व्याकुल सपने संजोए रहा हूँ।
मैं 'मन' बोल रहा हूँ। 

कभी व्यथित हूँ, कभी चिंतित हूँ, किन्तु मैं जीवित हूँ,
अभिलाषा और विश्वास से परिपूर्ण वर्षण से सिंचित हूँ ;
नहीं रवि-सा तेज मुझ में ,दीपक की भांति निरंतर जल रहा हूँ,
विमलता को अंगीकृत कर नई अंकिता धर रहा हूँ।
मैं 'मन' बोल रहा हूँ। 


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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