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और घूमने की अनंत परिकल्पनाएं !

Vikrant Viplov

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कई बार आदमी निकलता है
        
                                                    
                            
घूमने,घर से बाहर
देखता है--नदी जंगल पहाड़ मरुस्थल और पुराने खंडहर
इतना तक ही नहीं
देख लेता है---झील, पोखर, सुरंग और बर्फ की टिलाएं
यहां तलक की--देख लेता है
छोटे, बड़े, मंझले, संझले सब हुलियों में आदमियों को
इतना कुछ देख लेने के बाद भी
बहुत कुछ अधूरा रह जाता है देख पाना
आखिर आदमी घर से बाहर निकालने के बाद भी
हर चीज क्यों नहीं देख पाता
प्रकृति को देखता है
पर्यावरण को देखता है
मौसम को देखता है
मानव को देखता है
फिर भी अधूरी ही रह जाती है देखने की संकल्पनाएं
और घूमने की अनंत परिकल्पनाएं !
एक महीने पहले
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