तू ही आतंक, तू ही देहशत है।
तू सिर्फ़ डर ही नहीं, वहशत है।
तुझसे हर पन्ना मेरी जिदंगी का।
तू ही मौत का खेल है।
तू ही किस्मत है।
इससे ज़्यादा और क्या मांगू।
तू है तभी तो जिदंगी में फुर्सत है।
मैंने जो भी लिखा है, सोच समझ कर लिखा है।
कुछ ज़्यादा नहीं कुछ कम नहीं।
सारे हिसाब बराबर है।