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मज़हब नहीं।

vikram tupe

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कहते हैं प्यार का कोई मज़हब नहीं।
        
                                                    
                            
मैं लिखता हूँ मोहब्बत के ऊपर।
और मोहब्बत के ऊपर कोई कायदा क़ानून नहीं।
धर्म के बारे में, मैं ज़्यादा जानता तो नहीं।
इंसानियत हो इंसान के अंदर।
तो मैं समझता हूँ, उसे किसी मज़हब की जरूरत नहीं।
मुझे ये बात लिखने में बोहोत वक़्त लगा है।
लेकिन मैंने कुछ ग़लत तो लिखा नहीं।
मुझे मेरे ही खेल में हराने वालों।
खेल, खेल की बात है।
मग़र जिंदगी कोई खिलौना नहीं यारों।
मौत दावत देती जरूर है मगर जाने का नहीं यारों।
मुसीबत आए कोई तो भगवान को याद करना।
महज़ इंसानों में वो बात नहीं यारों।
मैं लिखता हूँ सिर्फ़ मेरा दिल।
क्यूंकि दिमाग़ की मुझमें कमी है यारों।
मेरे सामने ही लाशों का ढेर लग गया।
मैं चाहता था हम सब साथ मरे यारों।
क़िस्मत को कोई बदल नहीं सकता।
लकीरों से तक़दीर कोई छीन नहीं सकता।
मैं चाहता तो खुदा को भी झुका देता।
इंसान खुदा को भी टक्कर दे सकता है यारों।
3 महीने पहले
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Manju Sharma

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