जो लड़ गए देश के दुश्मन से,
बिन अपनी जान की परवाह किए।
वो वीर निराले अमर हुए,
कारगिल के रण में शीश दिए।।
हिमशिखरों की ऊँची चोटी पर,
दुश्मन के हर वार सहे।
भारत माँ की आन बचाने को,
हँसते-हँसते प्राण दिए।।
माँ की ममता, घर का आँगन,
सब कुछ पीछे छोड़ दिए।
सीने में बस तिरंगा लेकर,
जीवन के हर स्वप्न जिए।।
गोली, बारूद और बर्फ़ीले,
मौसम भी जिनको रोक न सके।
मुट्ठी भर उन वीरों ने ही,
दुश्मन के अभिमान हर लिए।।
आज तिरंगा जब लहराता,
उनके बलिदानों से लहराता।
हम चैनों की नींद जो सोते,
उन्होंने अपने प्राण दिए।।
जब तक सूरज चाँद रहेंगे,
भारत के सम्मान रहेंगे।
हर पीढ़ी श्रद्धा से बोलेगी—
कारगिल के वीर अमर रहेंगे।।
- विकास त्रिपाठी "विक्की"