महक उठी सारी महफ़िल, जब तुमने अपने बालों का जूड़ा खोला,
जैसे चाँद ने बादलों के पीछे से अपना चेहरा खोला।
रुक गईं हवाएँ, ठहर गया हर एक नज़ारा,
तेरे हुस्न ने जैसे इश्क़ का नया फ़साना बोला।
तेरी ज़ुल्फ़ों की ख़ुशबू से भीग गई फ़िज़ाओं की रूह,
हर फूल ने तेरे नाम का ही अफ़साना बोला।
लब ख़ामोश थे, मगर निगाहें सब कह गईं,
दिल ने धड़ककर मोहब्बत का तराना बोला।
बिखरे जो बाल तेरे कंधों पर शाम की तरह,
हर धड़कन ने तुझे अपना ठिकाना बोला।
तेरी एक अदा पर सदियाँ क़ुर्बान हो जाएँ,
इश्क़ ने भी तुझे अपना ख़ज़ाना बोला।
झुक गईं नज़रें, मुस्कुरा उठा मेरा मुक़द्दर,
वक़्त ने भी उस पल को सुहाना बोला।
काश ठहर जाता वहीं वो हसीं लम्हा,
जहाँ दिल ने तुझे अपना ज़माना बोला।
तू सामने थी तो हर दर्द कहीं खो गया,
रब ने तुझे मेरी दुआओँ का सिलसिला बोला।
महक उठी सारी महफ़िल, जब तुमने अपने बालों का जूड़ा खोला,
और मैंने उसी पल अपनी ज़िंदगी का सबसे हसीं ख़्वाब खोला।
-विकास त्रिपाठी "विक्की"