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फलसफा- ऐ- जिन्दगी

Vikash Tripathi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गुमान-ए-हुस्न हो या ज़अम-ए-ज़र का नशा,
        
                                                    
                            
ये सारे खेल हैं चन्द रोज़ के यारों!
जो आज फ़र्श से अर्श पर हैं इतराते,
ज़मीं पे लौटते देखा है मुज्तहर उनको! शायर-विकास त्रिपाठी
2 घंटे पहले
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Prasoon Saxena

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