गुमान-ए-हुस्न हो या ज़अम-ए-ज़र का नशा,
ये सारे खेल हैं चन्द रोज़ के यारों!
जो आज फ़र्श से अर्श पर हैं इतराते,
ज़मीं पे लौटते देखा है मुज्तहर उनको! शायर-विकास त्रिपाठी