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शीर्षक: “दुश्वारियों के पार”

Vikash Tripathi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ठोकरें बहुत खाई हैं मैंने ज़माने की,
        
                                                    
                            
पर हार कहाँ मानी है कभी दुश्वारियों से।

मैंने दर्द को सीने में हँसकर जगह दी है,
नहीं डरता अब दिल की बेकरारियों से।

कभी रास्ते ने रोका, कभी वक्त ने आज़माया,
मगर बढ़ता रहा अपनी लाचारियों से।

जो अपने थे, वही छोड़कर चले गए,
फिर भी रिश्ता निभाया दिल की यारियों से।

अँधेरों ने बहुत चाहा कि मैं टूट जाऊँ,
मगर रोशनी चुन ली मैंने अँधियारियों से।

हर एक ज़ख्म ने मुझको कुछ और सिखाया,
मैं और मज़बूत हुआ अपनी खामियों से।

अभी सफ़र में मेरी कई परीक्षाएँ हैं,
मुझे डर नहीं अब इन जिम्मेदारियों से।

मैं अपनी कहानी ख़ुद लिखूँगा एक दिन,
मुझे जीत हासिल होगी मेरी तैयारियों से।
— विकास त्रिपाठी “विक्की”
एक महीने पहले
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