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अंदाज मेरी खामोशी का....

Vikash Tripathi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नहीं जताना चाहता अपनी शोहरतों को ज़माने पर,
        
                                                    
                            
जलवे कभी-कभी ख़ल्वतों से भी बाहर आते हैं।

हमें आदत नहीं अपनी तारीफ़ ख़ुद करने की,
हमारे क़िस्से तो लोग ख़ुद ही सुनाते हैं।

ख़ामोश हैं तो इसे हमारी कमज़ोरी न समझना,
कुछ लोग दरिया होकर भी सागर में उतर जाते हैं।

नुमाइश से मुझे कोई वास्ता नहीं रहा,
हम वो हैं जो अँधेरों में भी उजाले कर जाते हैं।

नाम हो जाए तो उसे शोर क्यों बनाया जाए,
कुछ मुक़ाम ख़ामोशी से ही बेहतर नज़र आते हैं।

मैंने हुनर को कभी बाज़ार में सजाया ही नहीं,
जो क़द्रदान हैं, वो ख़ुद मेरे दर तक आते हैं।
- विकास त्रिपाठी ‘विक्की’
2 महीने पहले
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